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मूल अधिकारों से वंचित देश की सत्तर प्रतिशत आबादी ?

हरिद्वार। अन्तर्राष्ट्रीय उपभोक्ता कल्याण समिति के प्रदेश अध्यक्ष रामनरेश यादव ने कहा है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के सात दशक बीतने के बाद भी देश की सत्तर प्रतिशत आबादी अपने मौलिक अधिकारों से वंचित है और जब तक भारत का किसान सम्पन्न नहीं होगा तब तक न साइनिंग इण्डिया बनेगा न डिजिटल और न ही राइजिंग इण्डिया। देश को खुशहाल बनाने के लिए अन्नदाता का संरक्षण और संवर्द्धन आवश्यक है जिसके लिए किसानों को उसकी उपज का वाजिब मूल्य देना होगा जो अब तक देश की सत्ता पर काबिज रही सरकारों ने नहीं दिया।
प्रेस को जारी एक बयान में यादव ने कहा कि शिक्षा और चिकित्सा समाज की मूल आवश्यकता है लेकिन देश की 70 प्रतिशत आबादी को पिछले सत्तर वर्षों से न तो शिक्षा मिल रही न ही चिकित्सा। शिक्षा एवं चिकित्सा का पूर्ण रुपेण व्यवसायीकरण हो गया है और ये दोनों सुविधायें देश के बड़े या चुनिंदा शहरों तक ही समिति हैं। शिक्षा के अभाव में किसान का बेटा न तो उच्च स्तरीय सरकारी सेवाओं में जा पाता न ही स्वरोजगार के माध्यम से अपनी बेरोजगारी रोक पाता है। केवल राजनेता या उच्चाधिकारियों के बच्चे ही सरकारी सेवा प्राप्त कर पाते हैं जबकि किसान के बेटे को पुलिस और सेना की सेवा से ही संतुष्ट होना पड़ रहा है। अन्नदाता किसी का मोहताज नहीं है लेकिन उसको उसकी मेहनत और उपज का पूरा मूल्य न देकर केवल वोट बैंक के रुप में उसका इस्तेमाल किया जा रहा है। देश के ग्रामीण अंचलों में न तो अच्छे चिकित्सालय हैं न ही विद्यालय और जो सरकारी योजनायें ग्रामीण विकास के नाम पर चलायी जा रही वे सब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही हैं। सर्वविदित है कि भारत का किसान किसी का मोहताज नहीं है लेकिन उसकी मेहनत का मूल्य न देकर उसको बेचारा बनाकर केवल और केवल वोटबैंक के रुप में प्रयोग किया जा रहा है, ऐसा कब तक और चलेगा? भारत का किसान किसी भी सरकार से न तो कर्जमाफी चाहता है न ही किसी प्रकार का अनुदान, वह केवल अपनी मेहनत का हक चाहता है। सरकार के पास न तो कृषकों की उपज खरीदने के साधन हैं न ही उसके बच्चे को शिक्षित करने के लिए ग्रामीण अंचलों में ऐसे विद्यालय जो बड़े शहरों में कार्यपालिका एवं विधायिका के बच्चों के लिए उपलब्ध हैं। देश का किसान दिन-रात मेहनत करता है लेकिन उसकी मेहनत को दर किनार कर केवल बीज और खाद की कीमत लगाकर उसकी उपज का समर्थन मूल्य तय किया जाता है जबकि ब्यूरोक्रेसी विभिन्न वेतन आयोगोें का गठन कर अपने वेतन भत्ते बढ़ा लेती है जिससे देश में आर्थिक असमानता बढ़ रही है। लोकतंत्र में जनता का हित सर्वोपरि होता है, जनता ही अपने लिए सरकार का गठन करती है और करों का भुगतान कर सरकारों का संचालन करती है। जो सरकार के कर्मचारी हैं वे वास्तव में जनता के सेवक हैं लेकिन स्वतंत्रता का नाजायज फायदा उठाकर आज जो नौकर है वही मालिक पर राज कर रहा है। देश की जनता को अपने कर्तव्य के साथ ही अधिकारों के लिए भी सचेत होना होगा क्योंकि मेहनत का फल प्राप्त करना व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और किसान को यह अधिकार तभी प्राप्त होंगे जब वह शिक्षित होगा और अपने बीच के नेता का चयन करेगा। कोई भी नेता जब चुनाव लड़ता है तब वह जनता के बीच रहता है और जब चुनाव जीतकर मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बन जाता है, तब वह ब्यूरोक्रेसी का बंधक हो जाता है, आम जनता का कोई भी व्यक्ति बिना सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की अनुमति के बगैर अपने द्वारा चुने गए प्रतिनिधि से मिल नहीं सकता इस परम्परा को समाप्त किए बगैर देश की जनता का भला नहीं हो सकता, जनता करों का भुगतान करती रहेगी, नेता और ब्यूरोक्रेट्स जनता की मेहनत की कमाई से मलायी चाटते रहेंगे।

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