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धार्मिक उन्माद, अलगाववाद और क्षेत्रवाद ही विकास में सबसे बड़ी बाधा

हरिद्वार। धर्म और क्षेत्रवाद के आधार पर जब राजनीति शुरु हो जाये तो समझो किस उस प्रदेश या देश का विकास रुक गया है। हमारे संविधान ने सभी वर्गों न्यायपलिका, कार्यपालिका, विधायिका और प्रचार तंत्र सभी के कार्य निर्धारित किए हैं क्योंकि लोकतंत्र को संरक्षण और संवर्द्धन प्रदान करना इन चारों का कर्तव्य है जिससे देश की जनता के अधिकार सुरक्षित रहते हैं और गणतंत्र को मजबूती मिलती है। संविधान के अनुसार सत्ता और स्वार्थ के मुकाबले राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है, लेकिन जब सत्ता प्राप्ति के लिए झूठ, फरेब, धर्म और सुरक्षा को भी दांव पर लगा दिया जाये तो समझ लो कि उस देश का भविष्य बिगाड़ने वालों का बहुमत बढ़ रहा है।
सरकार वही सफल होती है जो संविधान के अनुरुप कार्य करे और सरकारी तंत्र संविधान तथा शासनादेशों के अनुरुप आचारण करे। यूपी में जब-जब राम मंदिर का मुद्दा उठा सत्तारुढ़ दल की साख गिरी। चाहे काशीराम और मुलायम सिंह यादव का गठबंधन हुआ या अब अखिलेश यादव और मायावती का गठबंधन हो। यूपी सरकार ने जब गाय, गंगा और हिन्दू-मुसलमान का नारा बुलन्द किया और पुलिस ने एनकाउन्टर अभियान चलाया तो सरकार फूलपुर, कैराना और नूरपुर हार गयी जहां तक एनकाउन्टर पालिसी का सवाल है तो तिवारी हत्याकाण्ड के बाद जब पुलिस वालों पर कार्यवाही हुई इसके बाद यूपी की एन्काउन्टर प्रक्रिया बंद हो गयी। प्रयाग के कुम्भ मेले का जब राजनीतिकरण किया तो मंदिर मुद्दा भी फ्लाप हो गया। जब प्रचार माध्यमों में कांग्रेस और सपा-बसपा का ग्राफ बढ़ने लगा तो कश्मीर में अर्द्धसैनिक बलों के काफिले पर आतंकी हमला हो गया। देश और समाज को बर्बाद करने के हथकण्डे अपनाये जा रहे हैं। जिस जनता ने अच्छे दिनों की चाहत में सरकार को चुना था उसके कार्यकाल में नोटबंदी, जीएसटी और ईडी, सीबीआई तथा अन्य ऐसे दवाबों का सामना करना पड़ेगा जनता को ऐसी उम्मीद नहीं थी। किसान, व्यापारी और मजदूर की आज क्या हालत है। किसी से छुपी नहीं है। समाज में भय का वातावरण इतना कि कोई भी मुुंह नहीं खोल सकता, सरकारी मशीनरी ही नहीं, प्रचार माध्यम भी अपना कर्तव्य भुलाकर कमाई के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर रहे हैं। बुद्धि और विवेक कहां चला गया शायद छुप कर चुनाव की प्रतीक्षा कर रहा है।
धर्म एक आस्था है जो आचरण में धारण करने की वस्तु है न कि राजनीति करने का माध्यम। उत्तराखण्ड में जब धर्म के नाम पर राजनीति शुरु हुई तो केदारनाथ में कितनी बड़ी त्रासदी हुई। उक्रांद ने क्षेत्रवाद के नाम पर राजनीति की तो जनता ने सिरे से नकार दिया। उत्तराखण्ड ने डेढ़ दशक तक विकास की किरण नहीं देखी तो पहाड़ से 70 प्रतिशत पलायन हो गया, अब आल वेदर रोड और रेल को पहाड़ पर चढ़ाने की याद आयी। राज्य से कृषि और कृषक दोनों समाप्त हो गए, उद्योग कारगर नहीं, लघु एवं कुटीर उद्योग कारगर भी कामयाब नहीं हुए, नेता हों या अधिकारी कोई भी पहाड़ पर जाना नहीं चाहता तो भगवान ही मालिक है। झूठे प्रचार से कब तक काम चलेगा।
वक्त की पुकार और सरकारी नीतियों में समन्वय न होेने के कारण देश के भविष्य को उज्जवल बनाने का सपना साकार होना भी दिवा स्वप्न ही लग रहा है। शहरी आबादी ने संतानोत्पत्ति सीमित कर दी है। अधिकांश परिवारों ने एक ही संतान पैदा करने का मन बना लिया है सेना में कौन भर्ती होगा जिसे देशभक्त बताया जा रहा उसका बेटा न सेना में जायेगा न संत बनेगा। जो अधिक बच्चे पैदा कर रहे उन्हें सेना में भर्ती करने में संदेह हो रहा तो देश की सुरक्षा कौन करेगा। धर्म के नाम पर मिलने वाले दान का उपभोग करने का अधिकार एक जाति विशेष को ही है अन्य जातियां तो धर्म के नाम पर दान और वोट देने के ही काम आती हैं आरक्षण का स्वरुप संविधान के विपरीत बनने लगा है। जिनकी आबादी 15 प्रतिशत है उनके लिए साठ प्रतिशत सरकारी सेवा और विधायिक मंें स्थान सुरक्षित हैं और जो 85 प्रतिशत हैं उन्हें चालीस प्रतिशत के भी लाले पड़े हैं। देश की चाल बिगड़ रही है देश को देश की तरह की चलाना पड़ेगा प्रोपेगण्डा से देश का अहित हो रहा है, लोकसभा चुनाव सिर पर है देश की जनता को अंधभक्ति से विरत होकर बुद्धि और विवेक से काम लेना होगा तभी देश और संविधान बचेगा।

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