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देश की मजबूती के लिए सत्ता में परिवर्तन जरुरी

तानाशाही और लोकतंत्र एक-दूसरे के विरोधी हैं, जब सत्ता पर तानाशाही का नशा सवार हो जाता है तो लोकतंत्र की व्यवस्था ध्वस्त होने लगती है और व्यक्ति विशेष जब देश और समाज से स्वयं को सर्वोपरि समझने लगे तब उसका और उसकी सत्ता का पतन सुनिश्चित हो जाता है। भारत के संविधान तथा सनातन धर्म शास्त्रों में सीधी व्यवस्था दी गई है जब-जब असुर एवं अभिमानियों की वृद्धि होती है तभी प्रकृति में एक बड़े बदलाव की बयार आती है और वर्तमान लोकसभा चुनाव भी लोकतंत्र एवं संविधान को बचाने की बहुत बड़ी बयार के रुप में देखा जा रहा है। तानाशाही गुलामी का प्रतीक होती है और ऐसी ही तानाशाही के परिणाम स्वरुप इस देश ने लगभग चार सौ वर्षों तक अंग्रेजों की गुलामी झेली।
सोलहवीं सदी में जब देश को गुलाम बनाने की नींव ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने रखी थी वैसी ही बुनियाद अब हमारी वर्तमान केन्द्रीय सत्ता ने चंद पूंजीपतियों को देश की अधिकांश व्यवस्थाएं सौंप कर रख दी है। इस व्यवस्था से देश के एक संचार विभाग, ओएनजीसी, एचएएल तथा रेलवे जैसे भारी भरकम एवं अर्थव्यवस्था के मुख्य स्रोत का निजीकरण जैसे हालत बनाकर देश को गुलामी की ओर ले जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। लोकसभा का यह चुनाव न केवल लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए लड़ा जायेगा बल्कि पूरा चुनाव ही झूठ के विरुद्ध होगा इसीलिए 1977 जैसे हालात बन रहे हैं उस समय भी एक दल विशेष के विरोध में सम्पूर्ण विपक्ष एकजुट हो गया था ठीक उसी तर्ज पर इस चुनाव में भी पूरा विपक्ष एक दल विशेष के विरोध में लामाबन्द हो रहा है हालांकि 18 से 25 मार्च तक प्रथम चरण के मतदान हेतु नामांकन की घोषणा की गई है लेकिन होलाष्टक होने के कारण नामांकन होली के बाद ही होंगे।
1975-76 में सामान्य आपातकाल का दंश झेल चुकी भारत की जनता ने 2016 में पहली बार आर्थिक आपातकाल का अनुभव किया और उसके एक वर्ष बाद ही जीएसटी तथा जाति एवं धर्म के नाम पर ऐसा ताण्डव प्रारम्भ हुआ कि देश की जनता चाहते हुए भी उसे विस्मृत नहीं कर पा रही है। देश ने पहली बार एक ऐसी सत्ता का अनुभव किया जिससे समाज का एक भी वर्ग प्रसन्न नहीं है जबकि देश की जनता ने इस सरकार का चयन अच्छे दिनों की प्रत्याशा में किया था और सरकार ने जो भी वादे किए उसके विपरीत कार्य किया।
देश में पहली बार ऐसा वातावरण बना कि देश की आजादी ही नहीं आम जनता के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था का संबल कहे जाने वाले विपक्ष की भूमिका और उसके अस्तित्व दोनों पर खतरा मंडरा रहा है। विपक्ष विहीन सत्ता का संचालन किस प्रकार होता है यह देश की जनता अनुभव कर चुकी है इसीलिए सम्पूर्ण विपक्ष में झूठ-फरेब के विरोध में देश की आजादी और आजाद भारत का संविधान दोनों को बचाने के लिए जो गठबंधन किया है उसमें किसी ने कोई विशेष शर्त न रखकर देश बचाने के नाम पर एकजुटता का संकल्प लिया है जबकि वर्ष 2014 में एक पार्टी, पार्टी विशेष विहीन भारत बनाने का नारा देकर जो गलती उस पार्टी ने की थी उसकी उसी गलती ने उसे चोर सिद्ध करने का ऐसा प्रचार किया कि 2014 में एक नारा लगता था कि अबकी बार-तो आवाज आती थी मोदी सरकार और आज जो नारा लगाया जाता है उसमें कहा जाता है कि चौकीदार-तो आवाज आती है चोर है। इसके अतिरिक्त धर्म और धर्मस्थल की राजनीति के बाद जब सेना पर हमले और सैनिक कार्यवाही को जब राजनीति में घसीटा गया तो देश की जनता अब समझ गयी है कि इन हाथों में देश सुरक्षित नहीं है।

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