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सैनिक कार्यवाही का राजनीतिकरण करना संविधान का अपमान

राजनीति कभी राज करने की नीति होती थी जिसे अब इतना घृणित बना दिया गया कि इसका उद्देश्य केवल और केवल सत्ता की प्राप्ति तक सीमित कर दिया गया है धर्म व्यक्ति का कर्म होता है और राष्ट्र धर्म सर्वोपरि होता है। धर्म से व्यक्ति और समाज को सत्कर्म की प्रेरणा मिलती है जबकि जन्मभूमि जिसे राष्ट्र और देश कहते हैं वह जन्म देने वाली माता से भी ऊंचा स्थान रखती है। यह सब अब अतीत के ख्वाब बनकर रह गए हैं आज के नेताओं को केवल और केवल सत्ता ही नजर आती है उसे प्राप्त करने के लिए धर्म, धर्मस्थल, धर्मगुरु, समाज और सेना को भी कुर्बान करना पड़े तो कोई हिचक नहीं होती है। हमारे राजनेताओं में देशभक्ति तो है लेकिन अन्तरात्मा में न होकर अब दिखावे में बदल गयी है जिसका प्रदर्शन और प्रयोग राजनैतिक लाभ लेने के बाद किया जाता है। चूंकि यह डिजिटल इण्डिया का युग है और थलसेना के स्थान पर वायुसेना का प्रयोग करने का युग आ गया है फिर भी वर्तमान सरकार में हुए उड़ी हमले का बदला दस दिन में और पुलवामा की आतंकी घटना जिसमें 42 जवानों की जाने गयीं उसका बदला बारह दिन बाद लिया गया। यहां प्रधानमंत्री की राष्ट्रभक्ति को सलाम है लेकिन 42 जवानों की शहादत के एक सप्ताह बाद यह कहना कि हमने सेना के हाथ खोल दिए और खुली छूट दे दी है इन शब्दों को सुनकर विपक्ष यही कयास लगाता है कि क्या पहले प्रधानमंत्री ने सेना के हाथ बांध रखे थे?
14/2 की घटना के बाद 26/2 को क्या जवाबी कार्यवाही हुई इसमें दोनों देशों के अलग-अलग दावे हैं जबकि अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया कुछ और ही बयां कर रहा है। वैसे तो युद्ध का जवाब युद्ध और खून का बदला खून होता है लेकिन युद्ध किसी समस्या का हल नहीं हो सकता। एक कहावत है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते, ऐसा अक्सर वे लोग ही कहते हैं जो सही बातें करना नहीं जानते या उनकी बातें ऐसी नहीं होती हैं जो दूसरों को सही लगें और सामने वाला उन्हें मानने के लिए मजबूर हो जाये।
भारत लोकतांत्रिक देश है और यहां की जनता ही अपने राजा ;शासकद्ध प्रधानमंत्री का चयन करती है। जनता जिसको जिम्मेदारी सौंपती है उसकी जवाबदेही भी तय करती है। देश की जनता पिछले पांच वर्षों से अच्छे दिनों की चाहत लगाये बैठी है लेकिन इस समयावधि में अच्छे दिन तो नहीं आये लेकिन उन अच्छे दिनों का रसास्वादन करने का सौभाग्य देश की शायद एक प्रतिशत जनता को ही मिला शेष 99 प्रतिशत जनता उम्मीदों के तालाब में डूबते हुए दम तोड़ रही है। देशभक्ति प्रत्येक देशवासी का अपने वतन के प्रति फर्ज होता है उसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं होता है जबकि वर्तमान में राजनीति के माध्यम से देशभक्ति का प्रदर्शन किया जा रहा है जिसे देश की जनता अब बर्दाश्त से बाहर की बात समझने लगी है। उड़ी हमले का बदला दस दिन बाद और पुलवामा हमले का बदला 12 दिन बाद लेने का अर्थ भी जनता अब दूसरे लहजे में निकाल रही है।
देश की जनता का मानना है कि भाजपा का जब हिन्दू-मुस्लिम एजेण्डा और मंदिर मुद्दा सफल नहीं हुआ तो उसने संतों सहारे प्रयाग कुम्भ मेले का राजनीतिकरण करना चाहा उसमें भी सफलता नहीं मिली तो पुलवामा में हुए आतंकी हमले की ही अपनी राजनीति को अंग बना लिया। देश को संकट में देखकर विपक्ष ने चोर, भ्रष्ट और फेंकू जैसे शब्दों पर पूर्ण विराम लगा दिया पूरे विपक्ष ने बोलती बंद कर ली तो बंदा रैली एवं सभाओं में मस्त हो गया और एक सप्ताह का इंतजार करने के बाद जैसे ही विपक्ष ने मुंह खोलना शुरु किया तभी एलान कर दिया कि हमने सेना के हाथ खोल दिए हैं और सैनिकों की शहादत व्यर्थ नहीं जायेगी परिणाम स्वरुप 26/2 को तीन आतंकी ठिकानों पर हवाई हमले कर ध्वस्त कर दिया। अब चूंकि युद्ध का वातावरण बना दिया तो विपक्ष के बोलने का मतलब ही नहीं होता, क्या लोकसभा चुनाव तक यही वातावरण बनाकर रखा जायेगा। ताकि पांच साल की नाकामियों को पाकिस्तान के सहारे भुला कर राष्ट्रभक्ति के नाम पर एक बार फिर सत्ता पर कब्जा किया जाये।

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