लोकसभा चुनाव लोकतंत्र का महापर्व होता है जो प्रत्येक पांच वर्ष में देश की तस्वीर और तकदीर बदलने के रुप में आयोजित किया जाता है, वैसे तो संविधान के अनुरुप इस चुनाव में देश की जनता अपने लिए समय की मांग के अनुरुप नियम और कानून बनाकर सत्ता का संचालन करने वाले प्रतिनिधियों का चयन करती है और नब्बे के दशक तक ऐसा ही हुआ भी है। कुछ समय से देश की सत्ता पर ऐसे लोगों की दृष्टि पड़ी जिनका देश की आजादी अथवा आजादी के बाद विकास में कोई योगदान नहीं रहा। जो अंग्रेजों के मुखबिर और देश को आजाद कराने वाले के कातिल के रुप में जाने जाते थे उन्हांेने बातें बनाकर देश की जनता पर ऐसा जादू किया कि जनता उनके झूठे वादों और 15-15 लाख के स्वार्थ में फंसकर देश का अहित कर बैठी। देश ने छः दशकों में जो उन्नति की थी वह सारी की सारी बीते पांच वर्ष में अवनति में बदल गयी और देश की अर्थव्यवस्था का यह आलम हो गया कि उंगली पर गिने चुने चंद लोगों को छोड़ कर पूरे देश की जनता संकटग्रस्त हो गयी। पूरे देश की आय घट कर गरीबी की रेखा की तरफ जा रही है और जो कच्छाधारी थे वे वातानुकूलित पांच-पांच मंजिली इमारतों के मालिक बन गए।
वैसे तो सत्ता का नियम है कि वह परिवर्तनशील होती है और देश की जनता भी कभी किसी एक दल को सत्तासीन न रख कर सभी दलों को देश की सेवा का अवसर प्रदान करती है और यही सोचकर जनता ने 2014 में सत्ता परिवर्तन किया था लेकिन जिस व्यक्ति और दल पर जनता ने विश्वास किया वह जनता की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। वर्ष 2014 में भाजपा ने 36 दलों के साथ गठबंधन कर केन्द्र में स्पष्ट बहुमत की सरकार बनायी, देश की जनता को उन्हांेने बडे़-बड़े आश्वासन दिए थे तो जनता ने भी दिल खोलकर बम्पर वोटों से विजयी बनाया लेकिन पूरा कार्यकाल बीतने के बाद तक भी केन्द्र की सत्तारुढ़ सरकार ने अपना एक भी वादा पूरा नहीं किया परिणाम स्वरुप बीच में हुए उप चुनावों में जनता ने नकार दिया। 2014 से लोकतंत्र के इस महापर्व में एक ऐसी परम्परा पड़ी कि चुनाव किसी विकास के मुद्दे पर न होकर दूसरे दल और विपक्ष की बुराई के आधार पर जीता गया और पूरे पांच साल तक दूसरों की बुराई का ही दौर चलता रहा। परिणाम स्वरुप लोकसभा के उपचुनाव एवं तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी दूसरे दलों ने सत्तारुढ़ दल की नाकामियों को बता कर चुनाव जीत लिया और वर्तमान चुनाव में भी सत्तारुढ़ दल की नाकामियों के आधार पर ही लड़ा जाने की उम्मीद है क्योंकि जनता भी अब विकास को भूलती जा रही है। जिस पार्टी ने विकास और जनहित के काम करवाये उसे जनता ने उस समय भले ही तवज्जो नहीं दी लेकिन अब जनता दोबारा उसी पार्टी की तरफ लौटने का मन बना रही है इसीलिए गठबंधन का जवाब गठबंधन से देने की तैयारी लगभग पूर्ण कर ली गई है और 28 मार्च से पहले चरण के चुनाव की रणभेरी प्रारम्भ हो जायेगी।
वैसे तो सत्ता का नियम है कि वह परिवर्तनशील होती है और देश की जनता भी कभी किसी एक दल को सत्तासीन न रख कर सभी दलों को देश की सेवा का अवसर प्रदान करती है और यही सोचकर जनता ने 2014 में सत्ता परिवर्तन किया था लेकिन जिस व्यक्ति और दल पर जनता ने विश्वास किया वह जनता की कसौटी पर खरे नहीं उतरे। वर्ष 2014 में भाजपा ने 36 दलों के साथ गठबंधन कर केन्द्र में स्पष्ट बहुमत की सरकार बनायी, देश की जनता को उन्हांेने बडे़-बड़े आश्वासन दिए थे तो जनता ने भी दिल खोलकर बम्पर वोटों से विजयी बनाया लेकिन पूरा कार्यकाल बीतने के बाद तक भी केन्द्र की सत्तारुढ़ सरकार ने अपना एक भी वादा पूरा नहीं किया परिणाम स्वरुप बीच में हुए उप चुनावों में जनता ने नकार दिया। 2014 से लोकतंत्र के इस महापर्व में एक ऐसी परम्परा पड़ी कि चुनाव किसी विकास के मुद्दे पर न होकर दूसरे दल और विपक्ष की बुराई के आधार पर जीता गया और पूरे पांच साल तक दूसरों की बुराई का ही दौर चलता रहा। परिणाम स्वरुप लोकसभा के उपचुनाव एवं तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी दूसरे दलों ने सत्तारुढ़ दल की नाकामियों को बता कर चुनाव जीत लिया और वर्तमान चुनाव में भी सत्तारुढ़ दल की नाकामियों के आधार पर ही लड़ा जाने की उम्मीद है क्योंकि जनता भी अब विकास को भूलती जा रही है। जिस पार्टी ने विकास और जनहित के काम करवाये उसे जनता ने उस समय भले ही तवज्जो नहीं दी लेकिन अब जनता दोबारा उसी पार्टी की तरफ लौटने का मन बना रही है इसीलिए गठबंधन का जवाब गठबंधन से देने की तैयारी लगभग पूर्ण कर ली गई है और 28 मार्च से पहले चरण के चुनाव की रणभेरी प्रारम्भ हो जायेगी।
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