हरिद्वार 4 फरबरी । समाजवादी विचारक तथा पत्रकार राम नरेश यादव ने कहा है कि देश की व्यवस्था संविधान से चलती है लेकिन धर्मनिरपेक्ष देश को जाति धर्म एवं हिन्दू मुस्लिम में बांट कर संवैधानिक व्यवस्था को समाप्त किया जा रहा है । पूरा विश्व विकास की ओर बढ़ रहा है लेकिन भारत की जनता का ध्यान विकास से हटाकर उसको व्यर्थ के मसलों में उलझाया जा रहा है यह संघ की बहुत बड़ी साजिश है जिसको समय रहते समाप्त नहीं किया गया तो देश दोबारा गुलामी और गरीबी के गर्त में समा जायेगा । देश का भविष्य बिगाड़ कर विदेशों को मालामाल करने की बड़े पैमाने पर योजना चल रही है, राफेल डील, खाद्यान आयात और भारत का धन लेकर विदेशों में भाग जाने वालों पर कोई कार्यवाही न होना, विकास कार्यों को ठप्प तीस हजार करोड़ की मूर्ति खड़ी करना तथा राम मंदिर निर्माण के लिए अर्धकुम्भ जैसे धार्मिक आयोजन का राजनीतिकरण करना देश धर्म और संस्कृति के सामने बहुत बड़ा खतरा उत्पन्न हो रहा है । देश में 70 प्रतिशत आबादी किसानों की है और उसको अपनी उपज के बाजिब मूल्य की आवश्यकता है, उसे कृषि उपज का उचित मूल्य न देकर प्रति परिवार मात्र 16 रुपये 70 पैसे की खैरात देकर अपमानित किया जाताज है, कृषि को प्रोत्साहन न देकर खाद्य तेल एवं दालों का विदेशों से आयात किया जाता है । देश की रक्षा करने वाली सेना को आधुनिक हथियार एवं लड़ाकू विमानों की आवश्यकता है उसमें घोटाला किया जा रहा है । शिक्षित नौजवानों को नौकरी की आवश्यकता है लेकिन नोटबन्दी और जी एस टी लागू कर नौकरियां समाप्त कर दी गई और युवाओं से पकोड़ा बेचने को कहा जाता है । व्यापारी ग्राहक चाहता है लेकिन जनता के पास पैसा नहीं है न ही आय के साधन । किसान की उपज का बाजिब मूल्य देने के लिए सरकार के पास पैसा नहीं, उद्योग पतियों को 18 लाख करोड़ रुपये का प्रतिवर्ष पैकेज दिया जा रहा है । नीरव मोदी, माल्या जैसे 35 हजार करोड़ रुपये लेकर विदेश भाग गये,15 बड़े पूजीपतियों का तीन लाख करोड़ का कर्ज माफ कर दिया गया । देश को गुलाम बनाने वालों को मजबूत किया जा रहा और देश को मजबूत बनाने वालों को कमजोर किया जा रहा, यही संघ और भाजपा की चाल है जिन्हें सत्ता से बेदखल करना देश की आवश्यकता है ।
समाचार-पत्र समाज के मार्ग दर्शक होते हैं और समाज के आईना (दर्पण) भी होते हैं, समाचार-पत्र का प्रकाशन एक ऐसा पवित्र मिशन है जो राष्ट्र एवं समाज को समर्पित होता है। समाचार-पत्र ही समाज और सरकार के बीच एक सेतु का काम करते हैं, जनता की आवाज सरकार तक तथा सरकार की योजनायें जनता तक पहुंचाकर विकास का सोपान बनते हैं। आजादी के पूर्व तथा आजादी के बाद से लगभग पांच दशक तक समाचार-पत्रों ने सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका का निर्वाह किया। 1975 में लगे आपातकाल से भी समाचार-पत्र विचलित नहीं हुए और उन्होंने अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह किया ऐसा तब तक ही हुआ जब तक पत्रकार ही समाचार पत्र के प्रकाशक, स्वामी एवं संपादक होते थे ऐसा अब नहीं है। समाचार पत्रों की निष्पक्षता और निर्भीकता कुछ पंूजीपतियों को रास नहीं आयी और उन्होंने मीडिया जगत पर अपना प्रभुत्व जमाना प्रारम्भ कर दिया। पहले तो समाचार-पत्रों की जनता से पकड़ ढीली करने के लिए इलैक्ट्रोनिक मीडिया को जन्म दिया और बाद में प्रिंट मीडिया का स्वरुप बदल कर उसके मिशन को समाप्त कर व्यावसायिकता में बदल दिया। चंद पूंजीपतियों ने सरकार से सांठगांठ कर मीडिया...
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