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भाजपा बनी देश पर संकट लाने का पर्याय

जाति और धर्म के आधार पर देश और समाज को बांट कर सत्ता प्राप्त करने वाली भाजपा भारत के लिए संकटों का पर्याय बन चुकी है। सरकार चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की हो या नरेन्द्र मोदी की, जहां संघ की विचारधारा का प्रयोेग होता है वहीं देश और समाज पर नाना प्रकार के संकटों का आगाज होने लगता है। वर्ष 2014 और इससे पूर्व भाजपा ने सत्ता में आने के लिए देश की जनता से जो वादे किए थे उनमें से एक भी पूरा नहीं किया बल्कि जो कहा उसका उल्टा किया जिससे राष्ट्र को अपार जन और धन की हानि उठानी पड़ी। केन्द्र में काबिज रही सरकारों ने पिछले छः दशक में जितनी प्रगति की उसकी दुर्गति भाजपा ने पांच साल में कर देश को बीस साल पीछे धकेल दिया है। देश की आजादी के सात दशकों में युद्ध को छोड़कर उतने सैनिक नहीं मारे गए जितने अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में हुए कारगिल तथा मोदी राज में उड़ी तथा पुलवामा में मारे गए जिससे भारत का सिर नीचे झुका है मजबूरन विश्व के अन्य देशों को भारत के प्रति बेचारा समझ कर सहानुभूति प्रकट करनी पड़ी। पिछले पांच सालों में सीमा पर मारे गए हमारे जवानों की संख्या यह बताती है कि देश का राजा शक्तिशाली है या बुजदिल, काम करने में विश्वास रखता है या केवल बातें बनाकर ही देश की जनता को गुमराह करता है। देश की जनता का ध्यान विकास कार्यों से हटाने के लिए ही कभी लव जिहाद में उलझाता है तो कभी श्मशान और कब्रिस्तान, ईद और दीपावली में तो कभी तीन तलाक का शगूफा छोड़कर अपनी राजनीति को धर्म और मजहब के इर्द-गिर्द घुमाता रहता है। बात राम मंदिर की होती है जो कभी नहीं बनेगा, बनती है पटेल की मूर्ति जिसके बदले एक पड़ोसी देश को 29 हजार करोड़ दिए जाते हैं जिसका कोई औचित्य नहीं। नोटबंदी कर देश पर बहुत बड़ा आर्थिक भार डाला जाता है जिससे समाज का प्रत्येक वर्ग प्रभावित होता है जीएसटी जैसे निर्णय से आर्थिक आदान-प्रदान का माध्यम माना जाने वाला व्यापार चौपट हो जाता है। सेना में वेतन के अलावा किसी प्रकार की  आधुनिकता के लिए कोई बजट नहीं। विमान खरीद में कमीशन खाया जाता है और कारगिल युद्ध के शहीदों के लिए खरीदे गए ताबूतों से भी कमीशन की बू आने के बाद ऐसी कफन खसोट सरकार से क्या उम्मीद की जा सकती है।
भारत की सत्तर प्रतिशत आबादी आज भी गांवों में रहती है जो कृषि पर आधारित है उसी आबादी का राष्ट्र की खाद्यान्न व्यवस्था बनाने तथा देश को सुरक्षा प्रदान करने का दायित्व है जो केन्द्र की राजनीति का शिकार हो रही है। राष्ट्र और समाज की रक्षा करना सरकार का दायित्व होता है लेकिन सरकार अपने दायित्व पर खरी नहीं उतर रही है, लोकतंत्र की मजबूती के लिए विपक्ष का मजबूत होना आवश्यक है लेकिन विपक्ष को कमजोर करने के लिए संवैधानिक संस्थाओं का सहारा लेना देश के लिए हानिकारक होता है, आज विपक्ष पर अनावश्यक दवाब बनाया जा रहा है तथा जवान और किसान दोनों असुरक्षित हैं। संकट की घड़ी में पूरा विपक्ष ही नहीं बल्कि देश का हर नागरिक सरकार के साथ है फिर भी चंद आतंकी हमारी व्यवस्था को चुनौती देकर घात लगाकर हमला करने में कामयाब हो जाते हैं तो देश की जनता का दिल दुःखना स्वभाविक है। 14/2 की घटना के बाद पूरा देश सरकार के साथ है विपक्ष भी राष्ट्र रक्षा में सहयोग के लिए सरकार के साथ है। विडम्बना यह है कि भाजपा की पिछली सरकार में आतंकी घटनायें बढ़ी यहां तक कि संसद पर भी हमला हुआ, कारगिल का युद्ध हुआ। उड़ी में हमला हुआ अब जो हमला हुआ वह आजादी के बाद का सबसे बड़ा हमला माना जा रहा है। आखिर कब तक इन घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी। देश की  जनता का धैर्य जवाब न दे इससे पूर्व सरकार को जनता के दिलों को जीत कर उसकी जान-माल की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम उठाना चाहिए। देश की जनता आखिर झूठे आश्वासनों पर कब तक भरोसा करती रहेगी? देश की जनता को अब विदेशों में जमा कालेधन की चाहत नहीं है वह जानती है कि वह उसे नहीं मिलेगा। जो लोग धन लेकर विदेश भाग गए जनता ने उन्हें भी झेला, नोटबंदी और जीएसटी से आर्थिक ढांचा कमजोर हुआ, बेरोजगारी बढ़ी, भ्रष्टाचार हुआ बाहर से कोई पूंजी निवेश नहीं हुआ जनता सबकुछ सहन कर सकती है लेकिन चंद आतंकी हमारी व्यवस्था को नेस्तानाबूत कर दें इसे देश बर्दाश्त नहीं करेगा, सरकार जनता के दिलों को जीते।

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