समाजवादी विचारक वरिष्ठ पत्रकार रामनरेश यादव ने कहा है कि भारत का भाग्य बदलने का झांसा देकर देश को तबाह करने वालों से छुटकारा पाने के लिए अब देश को दोबारा स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों की आवश्यकता है। जो जनता उस समय भाग्य बदलने का अर्थ नहीं समझी थी अब उसकी समझ में आ गया है कि महात्मा गांधी की हत्या करने वाले अब इख्लाख की हत्या और बुलन्दशहर जैसी घटनाओं के माध्यम से देश के बहुसंख्यक हिंदुओं को हत्यारा बनाने का कुचक्र रच रहे हैं। चार-पांच वर्ष पूर्व बात-बात पर देश की जनता दिल्ली के रामलीला मैदान में एकत्रित हो जाती थी वह भी उसी तरह से गायब हो गयी जैसे बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की आवाज। संविधान की शपथ लेने के बाद मंत्री और प्रधानमंत्री ने संविधान का अपमान किया और गाली गलौज तथा अपशब्दों की संस्कृति का चलन प्रारम्भ कर दिया।
मीडिया को खरीदकर दबायी गयी मीडिया की आवाज के कारण पांच साल में देश की क्या हालत हुई यह देश और समाज को बताना पड़ेगा। देश की आजादी को अघोषित गुलामी में बदलकर दिन रात हिंदु मुस्लिम जैसे शब्द ही सुनाई पड़ रहे हैं, हमें हिंदु मुसलमान बनाकर आपस में लड़वाने के बीज बोए जा रहे हैं जबकि पूरा विश्व प्रगति के पायदानों पर आगे बढ़ रहा है। संपूर्ण भारतवर्ष के राजनेता, व्यापारी, उद्योगपति एवं ब्यूरोक्रेटस भय के वातावरण में जीने को मजबूर हैं जबकि सामाजिक असमानता का यह आलम है कि देश के दस प्रतिशत घराने ही प्रगति कर रहे हैं और देश की कुल पंूजी के बराबर धन एक प्रतिशत उन पंूजीपतियों के पास है जो एक ही व्यक्ति को आजीवन सत्ता पर काबिज रखना चाहते हैं। देश की जनता को एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नेता की आवश्यकता थी लेकिन जनता के प्रचण्ड बहुमत के बाद एक ऐसा चैकीदार आ गया जिसने देश का धन लेकर कई नामचीन लोगों को विदेश भगा दिया और पूरे देश में नोटंबदी के साथ जीएसटी लागू कर देश की अल्पसंख्यक जनता को कंगाली के कगार पर पहुंचा दिया। देश को ऐसा नेतृत्व नहीं चाहिए जो दलित और पिछड़ों को एकजुट न होने दे, भाई बहन को इकठ्ठा न देख सके और राजनैतिक दलों के गठबंधन को ठगबंधन कहकर पुकारे। देश की जनता को शक की नजर से देखने वाला दूसरों को कभी सरकार विरोधी बताता है तो कभी हिंदू विरोधी और जिसको ज्यादा ही डराना होता है उसे भारत विरोधी और आय से अधिक संपत्ति का मालिक बताकर जेल में डालने की तैयारी प्रारम्भ कर देता है ऐसे नेता को सत्ता से बेदखल कर पूरे कार्यकाल की जांच करायी जाए और उस व्यक्ति विशेष की अनुकम्पा से कितने पुत्र और उद्योगपतियों की पूंजी में बेहताशा वृद्धि हुई उसका आंकलन कर संपूर्ण संपत्ति को राजकोष में जमा कराया जाए तथा दोषी व्यक्तियों को जेल भेजा जाए।
समाचार-पत्र समाज के मार्ग दर्शक होते हैं और समाज के आईना (दर्पण) भी होते हैं, समाचार-पत्र का प्रकाशन एक ऐसा पवित्र मिशन है जो राष्ट्र एवं समाज को समर्पित होता है। समाचार-पत्र ही समाज और सरकार के बीच एक सेतु का काम करते हैं, जनता की आवाज सरकार तक तथा सरकार की योजनायें जनता तक पहुंचाकर विकास का सोपान बनते हैं। आजादी के पूर्व तथा आजादी के बाद से लगभग पांच दशक तक समाचार-पत्रों ने सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका का निर्वाह किया। 1975 में लगे आपातकाल से भी समाचार-पत्र विचलित नहीं हुए और उन्होंने अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह किया ऐसा तब तक ही हुआ जब तक पत्रकार ही समाचार पत्र के प्रकाशक, स्वामी एवं संपादक होते थे ऐसा अब नहीं है। समाचार पत्रों की निष्पक्षता और निर्भीकता कुछ पंूजीपतियों को रास नहीं आयी और उन्होंने मीडिया जगत पर अपना प्रभुत्व जमाना प्रारम्भ कर दिया। पहले तो समाचार-पत्रों की जनता से पकड़ ढीली करने के लिए इलैक्ट्रोनिक मीडिया को जन्म दिया और बाद में प्रिंट मीडिया का स्वरुप बदल कर उसके मिशन को समाप्त कर व्यावसायिकता में बदल दिया। चंद पूंजीपतियों ने सरकार से सांठगांठ कर मीडिया...
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