हरिद्वार | भारत देश किसी दल या व्यक्ति विशेष की बपौती नहीं है, न तो राम किसी दल के आराध्य हैं न ही कोई धर्म स्थल। भारत का सँविधान धर्मनिरपेक्ष बनने का सन्देश देता है लेकिन जो लोग धर्म और राम के नाम पर राजनीति करते हैं धर्म उनको कभी माफ नहीं करेगा और जो हस्र धर्म की राजनीति करने वालो का हो चुका है वही हस्र इन नेताओं का होगा। यदि कोई संत धर्म और धर्मस्थल को छोड़ कर राजनीति में प्रवेश कर जाए और धार्मिक पर्व को राजनैतिक पर्व में बदलकर बहा कैविनेट की बैठक आयोजित कर दे इससे बड़ा देश की जनता का दुर्भाग्य और क्या होगा। जिस कुम्भ पर्व का आयोजन धर्म की आस्था के नाम पर होता है वहाँ यदि राजनीति शुरू हो जाये तो उस धर्म पर धर्मावलंवियो की आस्था कब तक रहेगी। उत्तर प्रदेश भारत की राजनीति का स्तम्भ है और यूपी में सपा बसपा का गठबंधन होने और कांग्रेस द्वारा प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में उतारने के बाद भाजपा के पैरों तले की जमीन खिसक गई है। अब उसकी आंखों के सामने इतना बड़ा अंधकार छा गया कि उसको राम मंदिर के अलाबा कुछ भी नजर नहीं आ रहा | हमारे धर्मशास्त्रों में वर्णन है कि जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है लेकिन जो धर्म के नाम पर राजनीति करता है धर्म उसके राजनैतिक कैरियर को समाप्त कर देता है | अतीत गवाह है कि अब तक जिसने धर्म के नाम पर राजनीति की उसका राजनैतिक कैरियर चौपट हो गया | यूपी में हुए गठबंधन से घबराकर भाजपा ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह सबसे कमजोर पार्टी है जो तीन दर्जन पार्टियों से गठबंधन कर केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई लेकिन जब दूसरे दलों ने गठबन्धन कर लिया तो बौखलाहट चरम पर पहुच गई। भाजपा उस पार्टी का नाम है जो धर्म, सम्प्रदाय तथा जाति के आधार पर सत्ता में काबिज रहना चाहती है चाहे उसे अख़लाक़ की हत्या करानी पड़े या बुलंदशहर में पुलिस इंसपेक्टर की उसे तो अपनी राजनीति शिखर पर चाहिए, जब भाजपा पर संकट आता है तो वह कहती है कि हिन्दू धर्म संकट में है, राम मंदिर संकट में है और जब जीत जाती है तो राम और सारे वादे भुला देती है। राम मंदिर न तो भारत की जनता की आवश्यकता है न ही सनातन धर्म की, न वेरोजगार युवाओं की न किसानों की और न ही व्यापारी अथवा माता बहनों की। राम मंदिर केवल भाजपा की आवश्यकता है। उसके बन जाने से केवल एक दर्जन पुजारी और एक दर्जन अन्य लोगों को आर्थिक लाभ होगा, शेष देश की जनता केवल राम के नाम पर दान देगी और एक जाति विशेष के लोगों की चांदी कटेगी। राम मंदिर न तो कृषकों की उपज बढ़ाएगा न ही बेरोजगारों को रोजगार देगा। भाजपा तो केवल राम के सहारे सत्ता चाहती है। उसके कर्म इतने गलत हैं कि नोटबन्दी, जी.एस.टी., सी.बी.आई. इत्यादि की कार्यशैली के साथ ही भाजपा राज के मुख्यमंत्री, मंत्री, प्रधानमंत्री और राज्यपाल सभी की कार्यशैली से देश की जनता इतनी त्रस्त हो गई कि वह इनकी सत्ता तो दूर सूरत भी देखना नहीं चाहती | देश के किसान की कैसी दुर्गति हुई, बैंकों की क्या हालत हो गई, आर बी आई और चुनाव आयोग को किस दृस्टि से जनता देख रही, सरकारी तंत्र का जनता के प्रति इन चार साल में कैसा व्यवहार रहा, देश की जनता अब और दुख सहन करने की शक्ति खो चुकी है, जनता अब मतदान के लिए तैयार है |
समाचार-पत्र समाज के मार्ग दर्शक होते हैं और समाज के आईना (दर्पण) भी होते हैं, समाचार-पत्र का प्रकाशन एक ऐसा पवित्र मिशन है जो राष्ट्र एवं समाज को समर्पित होता है। समाचार-पत्र ही समाज और सरकार के बीच एक सेतु का काम करते हैं, जनता की आवाज सरकार तक तथा सरकार की योजनायें जनता तक पहुंचाकर विकास का सोपान बनते हैं। आजादी के पूर्व तथा आजादी के बाद से लगभग पांच दशक तक समाचार-पत्रों ने सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका का निर्वाह किया। 1975 में लगे आपातकाल से भी समाचार-पत्र विचलित नहीं हुए और उन्होंने अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह किया ऐसा तब तक ही हुआ जब तक पत्रकार ही समाचार पत्र के प्रकाशक, स्वामी एवं संपादक होते थे ऐसा अब नहीं है। समाचार पत्रों की निष्पक्षता और निर्भीकता कुछ पंूजीपतियों को रास नहीं आयी और उन्होंने मीडिया जगत पर अपना प्रभुत्व जमाना प्रारम्भ कर दिया। पहले तो समाचार-पत्रों की जनता से पकड़ ढीली करने के लिए इलैक्ट्रोनिक मीडिया को जन्म दिया और बाद में प्रिंट मीडिया का स्वरुप बदल कर उसके मिशन को समाप्त कर व्यावसायिकता में बदल दिया। चंद पूंजीपतियों ने सरकार से सांठगांठ कर मीडिया...
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