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उन्नत कृषि के लिए जल संरक्षण देश की पहली आवश्यकता

‘जल ही जीवन है’ एक ऐसा स्लोगन था जिसे धर्म, विज्ञान और अध्यात्म सभी ने एक स्वर में आत्मसात करने का संदेश दिया था, कुछ दिन तक तो इस स्लोगन ने जल निगम तथा अन्य विज्ञापनों में स्थान पाया लेकिन जब से सरकार और समाज ने इसे भुनाया तभी से देश और समाज के साथ ही देश की कृषि उपज भी स्वच्छ जल के लिए तरस रही है तथा वायु, ध्वनि के साथ ही जल प्रदूषण देश की बड़ी समस्या बन गया है। जब से देश का मीडिया व्यवसायिक बनकर अपने मिशन से भटक गया तभी से राजनेता, संत, विद्वान, लेखक, कवि और साहित्यकारों के साथ ही वैज्ञानिक भी देश और समाज की मूल आवश्यकता से दूर हो रहे हैं। वर्तमान का प्रदूषित पानी आज देश की बड़ी समस्या बन रहा है लेकिन कोई भी सरकार, सामाजिक संस्था या वैज्ञानिक इस तरफ ध्यान न देकर केवल और केवल अपने-अपने आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने में लगे हैं लेकिन देश और समाज का जीवन स्तर कैसा बनता जा रहा है इसकी कोई परवाह नहीं है यदि वर्षा का जल संरक्षण और कारखानों का प्रदूषण तथा शहरों के दूषित जल के शुद्धिकरण के उपाय नहीं किए गए तो दो दशक में ही मानवता के लिए बड़ा खतरा पैदा हो जायेगा तब न दवाई और बोतलबंद पानी बनाने वाले बचेंगे और न ही कृषि उपज बचेगी यदि समय रहते इस समस्या का समाधान न किया गया तो न केवल मानव जीवन या कृषि उपज बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि को ही खतरा उत्पन्न हो जायेगा। आज गंगा, यमुना जैसी नदियों को पवित्र करने के नाम पर करोड़ों के वारे-न्यारे हो रहे हैं परिणाम शून्य है कुंए गायब हो गए है, हैण्डपम्प गायब होने वाले हैं, वर्षा का जल संचित नहीं हो रहा भूगर्भ जल स्तर नीचे जा रहा है, बोतलबंद पानी पीकर पूरा देश नाना प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हो रहा है। देश के नेता और ब्यूरोक्रेट्स अपार धन संपदा के स्वामी बन रहे हैं शेष जनता तथा कृषकों पर करों का बोझ लादा जा रहा है। जनता पर जितने कर बढ़ रहे हैं नेता और सरकारी मशीनरी के उतने ही वेतन भत्ते बढ़ रहे हैं। देश और समाज की आर्थिक असमानता चरम पर है राष्ट्रभक्ति और समाजहित समाप्ति की ओर है हर कोई स्वार्थी बन रहा है जो देश और समाज दोनों के लिए बड़ा खतरा है। देश में वर्षा का जल संरक्षित करने के उपाय किए जायें। नदियों पर छोटे-छोटे बांध बनाये जायें और जल प्रदूषण उत्पन्न करने वाले कारखानों को बंद कर कृषि उत्पादन को प्राथमिकता देकर राष्ट्र को स्वरोजगार सम्पन्न बनाया जाये। जल और वायु प्रदूषण की सर्वाधिक समस्या चीनी मिलोें से है चीनी मिलों से जल तथा वायु दोनों प्रदूषित होते हैं। चीनी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो रही है चीनी मिलें कृषकों का शोषण करती हैं और पूरे देश के कृषक अपनी उपज का अब अधिकांश उत्पादन गन्ने के रुप में कर रहे हैं जिसे निकट भविष्य में खाद्यान्न संकट आने की भी संभावनायें बलवान हो रही हैं। देश में बढ़ रहे गन्ना उत्पादन से खाद्यान्न उत्पादन का संतुलन बिगड़ रहा है, मोटे अनाज और दालों के उत्पादन में बेतहाशा गिरावट आयी है। दलहन और तिलहन का संकट पैदा हो जाता है जबकि गन्ना कृषकों को उनकी उपज का एक-दो साल तक भी मूल्य नहीं मिल पाता। देश, किसान तथा समाज तीनों समस्या ग्रस्त हैं यदि केन्द्र तथा राज्य सरकारें चाहें तो तीनों समस्याओं का समाधान एक वर्ष के अन्दर कर सकती हैं सरकार को चाहिए कि वह गेंहू, चावल के साथ ही मोटे अनाज तथा तिलहनी फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ा दे तो गन्ना उत्पादन अपने आप ही कम हो जायेगा क्योंकि किसानों की मुख्य उपज गेंहू, धान तथा दलहनी फसलों का वाजिब मूल्य न मिलने के कारण ही कृषक गन्ना उत्पादन कर रहे हैं और गुड तथा राब का उत्पादन समाप्त होने से ही मानव तन में अनेकों पोषण तत्वों की कमी आयी और चीनी के उपयोग और उत्पादन ने अनेकों बीमारियों को जन्म देकर देश को बर्बादी के कगार पर ला दिया।

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