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संवैधानिक संस्था की समरसता से बचेगा लोकतंत्र

लोकतंत्र में लोक (आम जनता) का अधिकार सर्वोपरि होता है और लोकसेवक तथा जन प्रतिनिधि दोनों का कर्तव्य होता है कि वे जनता के हितों की रक्षा करें तथा जो आवाज बहुमत में उठे उसके अनुरुप कार्य करें। इसके इतर यदि कोई लोकसेवक चाहे वह संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ही क्यों न हो उसे मनमर्जी या हठधर्मी से निर्णय लेने का अधिकार नहीं होता है। हमारे देश में वर्तमान केन्द्र सरकार और उसके अधीनस्थ कई संवैधानिक संस्थाओं पर जन भावनाओं के विपरीत कार्य करने के आरोप लग रहे हैं उनमें नोटबंदी के समय में आरबीआई भी अछूता नहीं रहा जबकि ईडी, सीबीआई और चुनाव आयोग सहित सरकार के अधीन मशीनरी पर जनहित के विरोध में कार्य करने के आरोप लग चुके हैं। लोकतंत्र का निर्माण जनता के मतों से होता है जनता ही अपनी पसंद का प्रतिनिधि चुनकर देश की संसद एवं विधानसभाओं में भेजती है और जब इसी चुनाव पर जनता के अधिकारों पर हनन करने का आरोप लग जाये तो उस संवैधानिक संस्था को निष्पक्ष रुप से अपने दायित्व का निर्वाह करने वाली नहीं कहा जा सकता है। लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और उस निष्पक्षता के लिए पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन के कार्यकाल को सदैव याद किया जायेगा जिन्होंने मतदान केन्द्रों पर केन्द्रीय बलों की तैनाती कर मत-पत्र लूटने जिसे बूथ-कैप्चरिंग भी कहते थे की घटनायें समाप्त करवा कर इतिहास रचा था। ईवीएम मशीनों का हमारे देश में जब से प्रयोग प्रारम्भ हुआ तभी से इनका विरोध हो रहा है 2009 में लालकृष्ण आडवाणी एवं सुब्रमण्यम स्वामी ने विरोध किया था उस समय एक ऐसा व्यक्ति भी प्रकाश में आया था जो चुनाव जिताने का ठेका लेता था उसके पास एक टीम थी जिसे तत्कालीन सत्तारुढ़ दल के साथ होने का आरोप था और 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद तो ईवीएम इतनी विवादास्पद हो गयी अब पूरा विपक्ष ही इसको हटाने की मांग कर रहा है बंगाल में सम्पन्न हुई महारैली में तो बाकायदा प्रस्ताव पारित कर इसके लिए एक समिति भी गठित कर दी गई। 2019 के आसन्न लोकसभा चुनाव में सत्तारुढ़ दल और चुनाव आयोग को छोड़कर लगभग सभी दल एकजुट होकर ईवीएम का विरोध करते हुए मतपत्र से मतदान की मांग कर रहे हैं लेकिन चुनाव आयोग अपनी हठधर्मी पर कायम है वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी अनुपालन करने को तैयार नहीं है क्योंकि वह स्वयं संवैधानिक संस्था है। अमेरिका, इंग्लैण्ड, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे कई देश अपने यहां ईवीएम को प्रतिबंधित कर चुके हैं लेकिन भारत का निर्वाचन आयोग वर्तमान केन्द्र सरकार को एक मौका और देना चाहता है चाहे देश की जनता नाराज हो जाये या विपक्षी आलोचनाओं का अंबार लगा दें चुनाव आयुक्त का कहना है कि वे अब दोबारा पेपर युग में नहीं लोटेंगे उनके इस बयान से संवैधानिक संस्था पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लग गया है। चुनाव आयोग का यह मनमाना कहें या तानाशाहीपूर्ण कहे जाने वाला निर्णय कई संभावनाओं को जन्म दे रहा है। विपक्ष का आरोप है कि ईवीएम से मनमाना निर्णय देने में अधिकारी सक्षम होते हैं इसके लिए पहली बात तो यही है कि मतदान कर्मियों को मेहनत नहीं करनी पड़ती क्योंकि जब से सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारियों के वेतनमान में बेहताशा वृद्धि हुई तब से उनकी कार्य क्षमता कम हुई और वे काम के बदले अलग से सुविधा शुल्क की मांग करते हैं जो भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। वैलेट पेपर से ही चुनाव को निष्पक्ष कहा जा सकता है और जब तक वैलेट पेपर से मतदान हुआ संवैधानिक संस्थाओं की साख बरकरार रही यदि चुनाव आयोग उत्कृष्टता ही प्रस्तुत करना चाहता है तो टी.एन. शेषन जैसा निर्णय ले और मतपत्र के माध्यम से चुनाव करवा कर देश की जनता की कसौटी पर खरा उतरने की मिशाल प्रस्तुत करे। यदि 2019 के चुनाव में भी ईवीएम मशीनों के माध्यम से गड़बड़ी की गई तो न तो चुनाव आयोग का कुछ बिगड़ेगा न ही सरकारी मशीनरी का लेकिन देश का इतना बड़ा नुकसान हो जायेगा कि देश 1947 से पूर्व वाली स्थिति में पहुंच जायेगा इस बात को सभी विपक्षी दलों तथा सत्तारुढ़ दल को गंभीरता से लेना होगा।

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