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चुनावों से गायब हो रहे विकास के मुद्दे, लोकतांत्रिक व्यवस्था को खतरा

लोकतांत्रिक व्यवस्था में देश की जनता विकास के आधार पर अपने प्रतिनिधियों का चयन कर लोकसभा एवं राज्य की विधानसभाओं में भेजती है, जिस राजनेता अथवा पार्टी का काम जनता को पंसद नहीं आता उसे आगामी चुनाव में बदल देती है। यह सत्य है कि जनता नेता के आश्वासन के आधार पर ही उसका चयन कर लेती थी और नेता जनता से किया गया वादा पूर्ण करता था, कुछ नेता एवं राजनैतिक दल आज भी हैं जिसका काम बोलता है लेकिन कुछ नेता तथा दल ऐसे भी है जो अपने चुनाव पूर्व किए गए वादों को चुनावी जुमला बताकर अपनी बात से मुकर जाते हैं और किसी भी वादे पर काम न कर केवल स्वार्थपूर्ति में ही पांच साल का कार्यकाल पूर्ण कर लेते हैं, यदि नेता ही नकारा निकल जाये तो जनता उसका कुछ नहीं कर सकती केवल उसको बदलने का काम ही कर सकती है लेकिन पांच साल तक देश का जो नुकसान हुआ उसकी भरपायी कहां से होगी।
2014 के लोकसभा चुनाव के बाद देश में ऐसा वातावरण बन गया कि मात्र दूसरे दल (सत्तारुढ़) की बुराईयों का तांता लगाया और दूसरे के प्रति जनता में नफरत के भाव भरकर सत्ता पर कब्जा कर लिया। जिसने उस व्यक्ति को यह गुरु मंत्र दिया वह उसके लिए सटीक बैठा लेकिन वह व्यक्ति उन गुरुओं के जाल में ऐसा फंसा कि अपना और देश दोनों का अहित कर बैठा परिणाम स्वरुप अब दूसरे दलों ने भी वही मंत्र उस नेता पर अप्लाई कर दिया। भाजपा नेता ने कांग्रेस की बुराई की तो कांग्रेस हार गयी और भाजपा जीत गयी। वही प्रक्रिया अब दूसरे दल अपना रहे हैं उस समय कांग्रेस भ्रष्ट थी तो अब चौकीदार चोर है इसी मुद्दे पर कांग्रेस ने तीन राज्यों की सत्ता कब्जा ली और चोर का शोर इतना मचा दिया कि आसन्न लोकसभा चुनाव सत्तारुढ़ के विरुद्ध होगा क्योंकि चौकीदार चोर है के नारे जोर पकड़ने लगे है। नेता ने दूसरे का नाम पप्पू रख दिया तो पप्पू ने चौकीदार को चोर कहकर पुकारना शुरु कर दिया। पहले वो जीत गया अब यह जीत गया, न तो पहले वाले ने विकास करने की बात कही थी न अब वाले ने कहा कि वह कोई विकास करेगा, क्या यही चुनाव का हेतु है? पहले चुनाव से पूर्व राजनैतिक दलों के घोषणा पत्र जारी होते थे और जीतने के बाद घोषणा पत्र के अनुरुप बजट तैयार किए जाते थे फिर उन पर अमल होता था अब ऐसा कुछ नहीं, क्यों? हमारे देश में दो ही बड़े राष्ट्रीय दल हैं अब दोनों का चरित्र और चाल बदल गए हैं तो जनता ने दोनों को आपस में मौसेरा भाई बताकर अब क्षेत्रीय दलों की ओर रुख कर लिया है। जनता जानती है कि क्षेत्रीय दल अपने राज्य के लिए स्थानीय होता है उसे विधानसभा का भी चुनाव वहीं से लड़ना है और लोकसभा का भी। जो राष्ट्रीय दल की श्रेणी में आ गया वह तो गुजरात और यूपी में दो-दो जगहों से चुनाव लड़ सकता है उसकी जवाबदेही न गुजरात में न ही यूपी में, वह अगले चुनाव में फिर अपना निर्वाचन क्षेत्र बदल सकता है। एक जमाना था जब नेता स्थानीय होता था और जनता के प्रति उसकी जवाबदेही होती थी लेकिन अब देश का राजनैतिक वातावरण बदला जा रहा है और राजनीति मुद्दा विहीन हो रही है।
भारतीय जनता पार्टी ने पूरे देश में क्षेत्रीय दलों से गठबंधन कर अपना प्रभुत्व स्थापित किया तो वही फार्मूला सपा-बसपा ने अपनाकर यूपी के फूलपूर, गोरखपुर और कैराना में भाजपा को तगड़ा झटका दिया। इतना ही नहीं आसन्न लोकसभा चुनावों में बाजी फतह करने के उद्देश्य से यूपी में सपा-बसपा ने चुनाव से पूर्व ही विधिवत गठबंधन की घोषणा कर दी जिसे पूरे प्रदेश ही नहीं देश की जनता स्वीकार कर रही है। उत्तर प्रदेश देश का ऐसा राज्य है जिसने सर्वाधिक प्रधानमंत्री और केन्द्रीय सत्ता के संचालन हेतु सर्वाधिक ब्यूरोक्रेट्स दिए हैं। वैसे तो कांग्रेस ने देश के विकास में काफी सहयोग दिया लेकिन उत्तर प्रदेश में राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक विकास की जो पटकथा लिखी गयी वह नब्बे के दशक के बाद ही शुरु हुई जब पहले सपा-बसपा गठबंधन और बाद में बसपा तथा उसके बाद सपा सरकार में जो कार्य हुए वे सम्पूर्ण भारतवर्ष में बेमिसाल हैं। राज्य की जनता आज भी सपा-बसपा के कार्यकाल में हुए निर्माण तथा विकास कार्यों को याद कर गठबंधन पर हार्दिक खुशी का इजहार कर रही है। भविष्य में जो भी चुनाव हो वह विकास के मुद्दे पर लड़ा जाये और एक-दूसरे की बुराई करने वाले नेताओं को जनता सिरे से नकार दे तभी देश और समाज का विकास होगा अन्यथा राष्ट्र के विकास का बेशकीमती समय उत्तराखण्ड की तरह यों ही अदला-बदली में बर्बाद होता रहेगा।

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