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पांच राज्यों में जनता के रुझान और विपक्षी एकता से बढ़ी भाजपा की मुसीबत

विपक्षी एकता के बनते समीकरणों ने भाजपा की नींद उड़ा दी है और पांच राज्यों में जनता ने जो संकेत दिए हैं उससे यह उम्मीद जगी है कि 2019 में मोदी की दोबारा सत्ता में आने की आशाएं धूमिल हो सकती हैं। हालांकि अभी तक पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के एक्जिट पोल ही दर्शाए गए हैं परिणाम आने अभी बाकी हैं। भाजपा भले ही ईवीएम के सहारे सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाये बैठी हो या नए चुनाव आयुक्त से कोई विशेष उम्मीद हो लेकिन लोकतंत्र में जन भावनाओं से बढ़कर कुछ नहीं होता है। कहते है दबकर चलने से राजनीति सफल नहीं होती है लेकिन अधिक दबंगई भी तानाशाही का पर्याय है जिसको जनता ने कभी बर्दाश्त नहीं किया।
जहां तक साढ़े चार साल की अवधि में विपक्ष के चुप रहने का सवाल है तो विपक्ष का कहना है कि उसने जनता के मताधिकार का सम्मान करते हुए सत्तारुढ़ दल को पूरा समय दिया लेकिन जब वह देश के लिए कुछ नहीं कर पाया तो विपक्ष अब और कितना इन्तजार कर सकता है। किसी भी नेता का अधिक शक्तिशाली बनना उसी के लिए घातक होता है, जनता तो सभी पर भरोसा करती है उसने भाजपा को भी कई मौके दिए लेकिन भाजपा कभी भी जन आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरी। आज सत्तारुढ़ भाजपा के पास जनता को जवाब देने के लिए कुछ भी नहीं है और सत्ता में आने के बाद भी भाजपा ने वही किया जो वह विपक्ष में रहकर करती थी तो ऐसी पार्टी को जनता क्यों दोबारा अवसर दे जिसके पास पांच साल की कोई उपलब्धि नहीं है। आज देश और समाज की क्या स्थिति है वह किसी से छुपी नहीं है। जहां तक राज्यों का सवाल है तो कहीं भी विपक्ष ने किसी भी राज्य में अस्थिरता फैलाने का कार्य नहीं किया। विपक्ष को जनता इसलिए भी दोबारा लाना चाहती है कि उसने सरकार की बड़ी से बड़ी नाकामियों पर भी न तो अपना मुंह खोला और न ही किसी प्रकार का आन्दोलन कर सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की जनता विपक्ष की भावनाओं की कद्र करती है लेकिन जब सत्तापक्ष जनता का दिल नहीं जीत सका तो जनता दोबारा किस आधार पर उसे अवसर प्रदान करे। देश की स्वतंत्रता के इतिहास में यह पहला अवसर है कि विपक्ष के बिना बताये ही जनता सत्ता पक्ष को सबक सिखाने का मन बना रही है। देश की जनता अब विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस की बुराई सुनते-सुनते परेशान हो गयी है वह 1913 से 18 तक लगातार छः साल से एक ही पार्टी और उसके नेताओं की बुराई सुन रही है और पूरा कार्यकाल निकलने के बाद भी जिस पार्टी ने जनता से किया एक भी वादा पूरा नहीं किया। 1952 से अब तक जनता ने जिन सरकारों को चुना उनमें ऐसी एक भी सरकार नहीं थी जो अपने वादों के विपरीत काम करे, यह पहली सरकार है जिसने जो भी वादे किए उनके विपरीत कार्य किया जिससे देश साढ़े चार वर्षों मंे 45 वर्ष पूर्व वाली स्थिति में पहुंच गया है। देश में अघोषित रुप से 1975-76 वाली स्थिति का जनता अत्याचारों को लेकर एहसास कर रही है परिणाम स्वरुप इस देश में जैसा चुनाव 1977 में हुआ था वैसा ही चुनाव 2019 में होने जा रहा है।
अत्याचार जब चरम पर पहुंच जाता है तब उसका अंत करने की योजना बनायी जाती है जिस प्रकार 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने आपातकाल में तानाशाही के साथ राज किया था उसी प्रकार नोटबंदी, जीएसटी तथा अन्य प्रकार से  मोदी ने अघोषित आपातकाल लगाकर पूरे देश पर कब्जा कर लिया और न्यायपालिका ने भी भ्रष्टाचार के एक ही मामले में बिहार के जगन्नाथ मिश्रा को बचाकर लालूप्रसाद यादव को जेल भेज दिया और जज की यह टिप्पणी कि अब लालू जेल में तबला बजायंेगे और भैंस चरायेंगे यह संवैधानिक अधिकारों के दुरुपयेग के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं जो तानाशाही के माध्यम से संविधान का अपमान कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को समाप्त करने का प्रमाण दे रहे हैं ऐसी स्थिति में न तो देश की जनता ऐसी सरकार को बर्दाश्त करेगी न ही विपक्ष, अब बदलाव निश्चित लग रहा है।

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