लोकतंत्र में जनता का अधिकार बड़ा होता है भले ही नेता एवं ब्यूरोक्रेसी जनता पर तरह-तरह के कर लगाकर अवैध वसूली कर जनता के धन से मौजमस्ती करते हैं लेकिन यह जनता है जो अपना मौका आते ही उनको चारो खाने चित्त कर देती है। किसी भी सरकार चाहे वह केन्द्र की हो राज्य की हो या छोटी सरकार कही जाने वाली स्थानीय निकाय अथवा ग्राम स्तर की सरकार हो जनता के पास उसे हटाने अथवा बरकरार रखने का मौका पांच साल बाद ही आता है। यदि कोई सरकार बीच में ही धराशायी हो जाये तो यह उसकी बदनसीबी होती है उसमें जनता का कोई रोल नहीं होता है। फिलहाल जनता जो निर्णय लेती है वह जांच परख कर और सरकार की कार्यशैली के आधार पर लेती है।
किसी भी सरकार का चयन भले ही पांच साल के लिए होता है लेकिन जनता चार साल बाद ही उसकी कार्यशैली पर अपना निर्णय सुनाना शुरु कर देती है। केन्द्र की भाजपा सरकार को देश की जनता ने 2014 में बम्पर बहुमत के साथ दिल्ली की कुर्सी सौंपी थी और दो-तीन साल तक उस सरकार ने जो भी भला किया या बुरा या भला बताकर देश और समाज के साथ बुरा किया जनता ने उसे सिर माथे पर रखा देश का विकास रुका या अर्थव्यवस्था खराब हुई, कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगे हों या अन्य मामलों में जमकर जुमलेबाजी हुई जनता ने उफ नहीं किया। विपक्ष भी जनता की अंधभक्ति के कारण मौन होकर बैठ गया और जनता को अच्छे दिनों का मजा लेने का नजारा देखता रहा। यह पहली ऐसी असंवेदनशील सरकार थी जो बैंक एवं एटीएम की लाइनों में लगकर जनता मरती रही लेकिन सरकार का कोई प्रतिनिधि उनका हाल-चाल पूछने या मुआवजा देने नहीं पहुंचा। विपक्ष को लालू यादव बनाने का भय दिखाकर ऐसा वातावरण बनाया गया कि विपक्ष का कोई भी दल या नेता चार साल तक नहीं बोला। इस बीच जो हुआ वह आजाद भारत की मिसाल है। जनता पर दवाब, नेताओं पर दवाब, ब्यूरोक्रेसी पर दवाब, चुनाव आयोग पर दवाब, रिजर्व बैंक पर दवाब, अपने संगठन के पुराने नेताओं पर दवाब, न्याय पालिका पर दवाब और यहां तक कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेन्सी सीबीआई पर दवाब डाल कर जो देश के संविधान और व्यवस्था के साथ खिलवाड़ किया गया वह अप्रत्याशित रहा।
देश की जनता ने चार साल तक जो इन्तजार किया वह अवधि कम नहीं थी और उत्तर प्रदेश के उप चुनावों के बाद जो परिणाम आने प्रारम्भ हुए वे सभी आगामी वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों की तरफ संकेत हैं चाहे उत्तराखण्ड के स्थानीय निकाय चुनाव हों अथवा पांच राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, मेघालय और मिजोरम के विधानसभा चुनाव हों सभी परिणाम कहीं न कहीं लोकसभा चुनावों के सेमी फाइनल के रुप में देखे जा रहे हैं। केन्द्र सरकार का यह देश की आजादी के बाद पहला ऐसा कार्यकाल रहा है जिसको देखकर ऐसा आभास हो रहा है कि शायद सत्तारुढ़ दल दोबारा सत्ता में वापसी चाहता ही नहीं है इसीलिए उसके कार्यकाल की न तो केन्द्र में कोई विशेष उपलब्धि है और न ही उसकी पार्टी द्वारा संचालित कई प्रदेशों की सरकारों की बल्कि विकास एवं जनहित के मुद्दों से भटकाने के लिए जिस तरह जनता का ध्यान इधर-उधर और व्यर्थ की बातों में उलझाया जा रहा है उसका देश की जनता पर ऐसा प्रभाव पड़ा है कि शायद इस देश की जनता भविष्य में कभी भी झूठे वादे और स्वार्थ के मुद्दों पर किसी भी पार्टी के भटकावे में नहीं आयेगी।
किसी भी सरकार का चयन भले ही पांच साल के लिए होता है लेकिन जनता चार साल बाद ही उसकी कार्यशैली पर अपना निर्णय सुनाना शुरु कर देती है। केन्द्र की भाजपा सरकार को देश की जनता ने 2014 में बम्पर बहुमत के साथ दिल्ली की कुर्सी सौंपी थी और दो-तीन साल तक उस सरकार ने जो भी भला किया या बुरा या भला बताकर देश और समाज के साथ बुरा किया जनता ने उसे सिर माथे पर रखा देश का विकास रुका या अर्थव्यवस्था खराब हुई, कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगे हों या अन्य मामलों में जमकर जुमलेबाजी हुई जनता ने उफ नहीं किया। विपक्ष भी जनता की अंधभक्ति के कारण मौन होकर बैठ गया और जनता को अच्छे दिनों का मजा लेने का नजारा देखता रहा। यह पहली ऐसी असंवेदनशील सरकार थी जो बैंक एवं एटीएम की लाइनों में लगकर जनता मरती रही लेकिन सरकार का कोई प्रतिनिधि उनका हाल-चाल पूछने या मुआवजा देने नहीं पहुंचा। विपक्ष को लालू यादव बनाने का भय दिखाकर ऐसा वातावरण बनाया गया कि विपक्ष का कोई भी दल या नेता चार साल तक नहीं बोला। इस बीच जो हुआ वह आजाद भारत की मिसाल है। जनता पर दवाब, नेताओं पर दवाब, ब्यूरोक्रेसी पर दवाब, चुनाव आयोग पर दवाब, रिजर्व बैंक पर दवाब, अपने संगठन के पुराने नेताओं पर दवाब, न्याय पालिका पर दवाब और यहां तक कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेन्सी सीबीआई पर दवाब डाल कर जो देश के संविधान और व्यवस्था के साथ खिलवाड़ किया गया वह अप्रत्याशित रहा।
देश की जनता ने चार साल तक जो इन्तजार किया वह अवधि कम नहीं थी और उत्तर प्रदेश के उप चुनावों के बाद जो परिणाम आने प्रारम्भ हुए वे सभी आगामी वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों की तरफ संकेत हैं चाहे उत्तराखण्ड के स्थानीय निकाय चुनाव हों अथवा पांच राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, मेघालय और मिजोरम के विधानसभा चुनाव हों सभी परिणाम कहीं न कहीं लोकसभा चुनावों के सेमी फाइनल के रुप में देखे जा रहे हैं। केन्द्र सरकार का यह देश की आजादी के बाद पहला ऐसा कार्यकाल रहा है जिसको देखकर ऐसा आभास हो रहा है कि शायद सत्तारुढ़ दल दोबारा सत्ता में वापसी चाहता ही नहीं है इसीलिए उसके कार्यकाल की न तो केन्द्र में कोई विशेष उपलब्धि है और न ही उसकी पार्टी द्वारा संचालित कई प्रदेशों की सरकारों की बल्कि विकास एवं जनहित के मुद्दों से भटकाने के लिए जिस तरह जनता का ध्यान इधर-उधर और व्यर्थ की बातों में उलझाया जा रहा है उसका देश की जनता पर ऐसा प्रभाव पड़ा है कि शायद इस देश की जनता भविष्य में कभी भी झूठे वादे और स्वार्थ के मुद्दों पर किसी भी पार्टी के भटकावे में नहीं आयेगी।
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