हरिद्वार। समाजवादी विचारक रामनरेश यादव ने कहा है कि कृषि भारत की आत्मा और ग्रामीण अंचल ही भारतमाता की वास्तविक तस्वीर है। देश की सत्तर प्रतिशत आबादी आज भी गांव एवं देहात में निवास करती है तथा भारत विश्व का पहला ऐसा देश है जिसने अपनी स्वतंत्रता के बाद सबसे पहले खाद्यान्न में आत्म निर्भरता प्राप्त की। भारत में जिस दिन कृषि को अधिमान देने वाली सरकार आ जायेगी उसी दिन देश की सत्तर प्रतिशत बेरोजगारी एवं नब्बे प्रतिशत गरीबी की समस्या दूर हो जायेगी। देश में अब तक सत्ता पर काबिज रही सरकारों ने उद्योगों, पूंजीपतियों एवं राजनेता तथा ब्यूरोक्रेसी के कल्याण की ही योजनायें बनायीं जिससे पूंजीपति, राजनेता एवं सरकारी कर्मचारी सम्पन्न हो गए और कृषक को आज भी अपनी उपज का लागत मूल्य नहीं मिल पाता है। जिससे पूरा देश सामाजिक विषमता का शिकार है। देश की 85 प्रतिशत जनता करों से दबकर महंगाई की मार झेल रही है और 15 प्रतिशत आबादी राजशाही जीवन जी रही है जिससे देश कभी आगे नहीं बढ़ सकता, सरकार की नीतियों में बदलाव की आवश्यकता है, अब तक जिन राजनेता अथवा राजनैतिक दलों का देश पर शासन रहा उन्होंने पूंजीपतियों, राजनेताओं एवं सरकारी कर्मचारी तथा अधिकारियों के उन्नयन के ही नियम बनाये जिनसे देश और समाज का भला होने वाला नहीं है। देश में बेरोजगारी, भुखमरी और आर्थिक विषमता लगातार बढ़ रही है और जब तक भारत के गांवों में रहने वाली सत्तर प्रतिशत आबादी जो कृषि पर आधारित है उसके उन्नयन की योजनायें नहीं बनती देश कभी भी विकसित राष्ट्र नहीं बन सकता है। देश की सवा सौ करोड़ जनता में राजनेताओं की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं है जबकि चार प्रतिशत कर्मचारी सरकारी तथा अर्द्ध सरकारी सेवाआयें में हैं। हमारे देश के राजनेताओं का विशेष फोकस उद्योगों को प्रोत्साहन देने पर रहता है उनमें भी तीन-चार प्रतिशत लोगों की ही रोजी-रोटी चल पाती है क्योंकि उद्योगपति अपने कर्मचारियों को मेहनत का पूरा पैसा नहीं देता है। हमारे देश की चार-पांच प्रतिशत आबादी ऐसी है जो लघु उद्योग, व्यापार तथा कृषि क्षेत्र से जुड़े स्वरोजगार के माध्यम से अपना-अपना पोलन-पोषण करते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में केवल 15 प्रतिशत आबादी सुख, सम्पन्नता एवं विलासिता पूर्ण जीवन जी रही है जबकि शेष 85 प्रतिशत जनता में अधिकतम 10-15 प्रतिशत ही ऐसे हांेगे जो मध्यम श्रेणी का जीवनयापन कर रहे जबकि देश की सत्तर प्रतिशत आबादी अभावों में जीवन जीने को मजबूर है।
देश का धन व्यर्थ की योजनाओं मंे बर्बाद हो रहा है, मिड डे मील, बेरोजगारी भत्ता, वजीफा, किसानों की ऋण माफी और दो-तीन रुपये किलो गेंहू-चावल बेचने जैसी योजनाओं को तुरन्त बंद कर देना चाहिए ये सभी योजनायें विकास में बाधक और व्यक्ति को मेहनत तथा नकारा बनाने वाली है। देश को किसी राम मंदिर की आवश्यकता नहीं है न ही किसी वेतन आयोग की आवश्यकता है ये सब सामाजिक विषमता के कारक हैं इससे सामाजिक विषमता बढ़ती है और समाज के धर्मान्ध होने से साम्प्रदायिकता बढ़ती है। जाति और धर्म का भेदभाव तथा कट्टरता राष्ट्रीयता एकता में बाधक है। सामाजिक विषमता ही राष्ट्र की उन्नति में बाधक है परिणाम स्वरुप जो समर्थ और धनवान हैं वही और सुविधा सम्पन्न बनता जा रहे हैं और जो अभावों की जिन्दगी जी रहे हैं वह करों की मार और महंगाई झेलते-झेलते आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। राजनीति एवं ब्यूरोक्रेसी के आंकड़े दर्शाते हैं कि नेताओं के बच्चे ही नेता और पूंजीपति बन रहे हैं तथा सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारियों के बच्चे ही आईएएस, आईपीएस, पीसीएस, आईएफएस तथा चिकित्सक एवं इंजीनियर बनकर देश की गरीब जनता की खून-पसीन की कमाई पर मौज कर रहे हैं। हमारे देश के किसी भी उच्चाधिकारी के वेतन, भत्ते, आवासीय तथा वाहन तथा चिकित्सकीय सुविधाओं पर प्रतिमाह बीस से पचास लाख रुपये तक व्यय होता है जबकि कर्ज से दबे किसान और गरीब धनाभाव के कारण आत्मदाह करने पर मजबूर हैं जो कर देता है, खाद्यान्न उत्पादन करता है वह झोपड़ियों में फटेहाल रहता है जबकि राजनेता और ब्यूरोक्रेट्स शाही वातानुकूलित आवास एवं वाहनों में मौज मस्ती ले रहे हैं। भारत में लोकतंत्र है जिसे प्रजा का राज कहते हैं। जनता ही इस देश में राजनेताओं का चयन करती है और जनता ही अपने करों से राजस्व सरकारी खजाने में जमा कराती है लेकिन जो मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बन जाता उसका खर्चा लाखों से लेकर करोड़ों रुपये प्रतिमाह हो जाता है। उसका रोटी, कपड़ा, मकान से लेकर शाही जीवन सब निःशुल्क हो जाता है वेतन उसकी पैत्रिक सम्पत्ति और भ्रष्टाचार करने का उसको अघोषित लाइसेंस मिल जाता है।
क्या विडम्बना है कि देश का मालिक बेहाल और नौकर मालामाल यह सब अब तक देश की सत्ता पर काबिज रही सरकारों की संकीर्ण मानसिकता और स्वार्थपरता का परिणाम है। आज देश को कृषि तथा कृषकों को सम्मान देने वाली सरकार की आवश्यकता है इसके लिए ऐसी सरकार बननी चाहिए जो पिछली सरकारों की योजनाओं को बदलकर राष्ट्र और समाजहित की योजनायें लागू कर सके।
देश का धन व्यर्थ की योजनाओं मंे बर्बाद हो रहा है, मिड डे मील, बेरोजगारी भत्ता, वजीफा, किसानों की ऋण माफी और दो-तीन रुपये किलो गेंहू-चावल बेचने जैसी योजनाओं को तुरन्त बंद कर देना चाहिए ये सभी योजनायें विकास में बाधक और व्यक्ति को मेहनत तथा नकारा बनाने वाली है। देश को किसी राम मंदिर की आवश्यकता नहीं है न ही किसी वेतन आयोग की आवश्यकता है ये सब सामाजिक विषमता के कारक हैं इससे सामाजिक विषमता बढ़ती है और समाज के धर्मान्ध होने से साम्प्रदायिकता बढ़ती है। जाति और धर्म का भेदभाव तथा कट्टरता राष्ट्रीयता एकता में बाधक है। सामाजिक विषमता ही राष्ट्र की उन्नति में बाधक है परिणाम स्वरुप जो समर्थ और धनवान हैं वही और सुविधा सम्पन्न बनता जा रहे हैं और जो अभावों की जिन्दगी जी रहे हैं वह करों की मार और महंगाई झेलते-झेलते आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। राजनीति एवं ब्यूरोक्रेसी के आंकड़े दर्शाते हैं कि नेताओं के बच्चे ही नेता और पूंजीपति बन रहे हैं तथा सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारियों के बच्चे ही आईएएस, आईपीएस, पीसीएस, आईएफएस तथा चिकित्सक एवं इंजीनियर बनकर देश की गरीब जनता की खून-पसीन की कमाई पर मौज कर रहे हैं। हमारे देश के किसी भी उच्चाधिकारी के वेतन, भत्ते, आवासीय तथा वाहन तथा चिकित्सकीय सुविधाओं पर प्रतिमाह बीस से पचास लाख रुपये तक व्यय होता है जबकि कर्ज से दबे किसान और गरीब धनाभाव के कारण आत्मदाह करने पर मजबूर हैं जो कर देता है, खाद्यान्न उत्पादन करता है वह झोपड़ियों में फटेहाल रहता है जबकि राजनेता और ब्यूरोक्रेट्स शाही वातानुकूलित आवास एवं वाहनों में मौज मस्ती ले रहे हैं। भारत में लोकतंत्र है जिसे प्रजा का राज कहते हैं। जनता ही इस देश में राजनेताओं का चयन करती है और जनता ही अपने करों से राजस्व सरकारी खजाने में जमा कराती है लेकिन जो मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बन जाता उसका खर्चा लाखों से लेकर करोड़ों रुपये प्रतिमाह हो जाता है। उसका रोटी, कपड़ा, मकान से लेकर शाही जीवन सब निःशुल्क हो जाता है वेतन उसकी पैत्रिक सम्पत्ति और भ्रष्टाचार करने का उसको अघोषित लाइसेंस मिल जाता है।
क्या विडम्बना है कि देश का मालिक बेहाल और नौकर मालामाल यह सब अब तक देश की सत्ता पर काबिज रही सरकारों की संकीर्ण मानसिकता और स्वार्थपरता का परिणाम है। आज देश को कृषि तथा कृषकों को सम्मान देने वाली सरकार की आवश्यकता है इसके लिए ऐसी सरकार बननी चाहिए जो पिछली सरकारों की योजनाओं को बदलकर राष्ट्र और समाजहित की योजनायें लागू कर सके।
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