उत्तराखण्ड को नया राज्य बने दो दशक का समय पूरा होने वाला है, 18 वर्षों में कांग्रेस और भाजपा ने राज्य को आठ नेताओं को नौ बार मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलायी। सर्वाधिक अस्थिरता का वातावरण भाजपा सरकारों में रहा जिसने पहले और तीसरे कार्यकाल के सात वर्षों में पांच शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किए जबकि तीन मुख्यमंत्री कांग्रेस ने भी राज्य को दिए हैं। राज्य की जनता जिन राजनेताओं के कार्यकाल को यादगार के रुप में जानती है उनमें कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी तथा हरीश रावत के कार्यकाल हैं जबकि आम जनता की नजर में भाजपा का एक भी मुख्यमंत्री जनता की कसौटी पर खरा नहीं उतरा। राज्य के विकास में जो मुख्य बाधायें रही हैं उनमें तीन वाद हैं, कुमायंू-गढ़वालवाद, ठाकुर-ब्राह्मणवाद तथा तीसरा है पहाड़-मैदानवाद जब तक इन तीन वादों को समाप्त नहीं किया जाता तब तक राज्य का विकास होने वाला नहीं है, इन तीनों वादों का विकल्प समाजवाद में है और उत्तराखण्ड राज्य को विकास की पटरी पर लाकर यदि उन्नतिशील बनाना है तो उपरोक्त सभी वादों से ऊपर उठकर समाजवाद लाना होगा।
उत्तराखण्ड राज्य देश का पहला ऐसा राज्य है जहां विकास की अपार संभावनायें पहले थीं, आज हैं और आगे भी रहेंगी। विकास कार्यों के लिए कभी देर नहीं होती है जब जागो तभी सवेरा होना माना जाता है लेकिन जागना तो पड़ता है, जो सोता है सो खोता है और जो जागता है वही पाता है। राज्य की जनता यदि उत्तराखण्ड का विकास चाहती है तो उसे जागना तो पड़ेगा। किसी भी राष्ट्र, राज्य अथवा समाज के विकास में बाधक कई विसंगतियां एवं विडम्बनायें होती हैं उन्हें दूर करने का मन बनाना होगा। दल बदलू नेता स्वार्थी होता है उसकी आस्था न किसी पार्टी में होती है न ही विकास में वह केवल और केवल अपने भले के लिए ही दल बदलता रहता है। उत्तर प्रदेश में जिस प्रकार नरेश अग्रवाल और अमर सिंह हैं उसी प्रकार के नेता उत्तराखण्ड में भी हैं जो अपने स्वार्थ के लिए राज्य की जनता को बरगला कर राज्य को विकास के मार्ग से भटका कर अपना विकास कर रहे हैं। राज्य की जनता को उनकी कार्यशैली का आकलन कर निर्णय लेना होगा तभी राज्य में समग्र विकास की किरण फूटेगी। स्वार्थ ही राजनेता के पतन का कारण बनता है और जिसकी सोच सार्वजनिक हित वाली होती है वही विकास के मार्ग से होता हुआ राजनीति के शीर्ष तक जाता है। जरा विचार करें पं. गोविन्द बल्लभ पंत सर्वहितकारी राजनेता थे लेकिन के.सी. पंत एवं इला पंत न तो कांग्रेस की कसौटी पर खरे उतरे न ही भाजपा की। हेमवन्ती नंदन बहुगुणा की विचारधारा उत्तम थी लेकिन उनके दल बदलने का परिणाम यह है कि उनके पुत्र और पुत्री दोनों दल बदल के दलदल में धंस गए। चौ. चरन सिंह उच्च कोटि के राजनेता थे लेकिन उनके पुत्र अजीत सिंह उनकी विरासत को आगे नहीं बढ़ा पाये। कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरु, इन्दिरा गांधी एवं राजीव गांधी के बाद राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष बनते ही एक साल के अन्दर तीन राज्यों पर कब्जा जमा लिया। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव विकास कार्य कराने के लिए 2012 से 17 में एक मिसाल के रुप में जाने जा रहे हैं।
उत्तराखण्ड में विकास के पटरी पर न आने के कई कारण हैं, यहां के राजनेता और ब्यूरोक्रेट्स केवल अपना विकास चाहते हैं राज्य का नहीं। नए राज्य की मांग करने वाले राज्य आन्दोलनकारी आज भी यही चाहते हैं कि यह राज्य उनकी पैत्रिक सम्पत्ति है इस पर उनका कब्जा पुश्तैनी (पीढ़ी दर पीढ़ी) चलता रहे जबकि नए राज्य को प्रोत्साहन देने वाला विशेष राज्य का दर्जा केन्द्र ने समाप्त कर दिया है। व्यवहारिकता भी यही है कि यदि कोई व्यक्ति किसी पुल के निर्माण की मांग करता है और उसकी मांग स्वीकार करते हुए पुल निर्माण को स्वीकृति मिल जाये तो यह आवश्यक नहीं कि पुल निर्माण का ठेका भी उसी व्यक्ति को दिया जाये। इस राज्य में आज तक इसी बात की लड़ाई है यही कारण है कि अब तक सत्ता पर काबिज रहे राजनेताओं में से एक ने भी पहाड़ के विकास की नहीं सोची परिणाम स्वरुप विकास के अभाव में पहाड़ों से बड़ी संख्या में पलायन हुआ जिससे राज्य निर्माण का सपना चकनाचूर हो गया।
उत्तराखण्ड राज्य देश का पहला ऐसा राज्य है जहां विकास की अपार संभावनायें पहले थीं, आज हैं और आगे भी रहेंगी। विकास कार्यों के लिए कभी देर नहीं होती है जब जागो तभी सवेरा होना माना जाता है लेकिन जागना तो पड़ता है, जो सोता है सो खोता है और जो जागता है वही पाता है। राज्य की जनता यदि उत्तराखण्ड का विकास चाहती है तो उसे जागना तो पड़ेगा। किसी भी राष्ट्र, राज्य अथवा समाज के विकास में बाधक कई विसंगतियां एवं विडम्बनायें होती हैं उन्हें दूर करने का मन बनाना होगा। दल बदलू नेता स्वार्थी होता है उसकी आस्था न किसी पार्टी में होती है न ही विकास में वह केवल और केवल अपने भले के लिए ही दल बदलता रहता है। उत्तर प्रदेश में जिस प्रकार नरेश अग्रवाल और अमर सिंह हैं उसी प्रकार के नेता उत्तराखण्ड में भी हैं जो अपने स्वार्थ के लिए राज्य की जनता को बरगला कर राज्य को विकास के मार्ग से भटका कर अपना विकास कर रहे हैं। राज्य की जनता को उनकी कार्यशैली का आकलन कर निर्णय लेना होगा तभी राज्य में समग्र विकास की किरण फूटेगी। स्वार्थ ही राजनेता के पतन का कारण बनता है और जिसकी सोच सार्वजनिक हित वाली होती है वही विकास के मार्ग से होता हुआ राजनीति के शीर्ष तक जाता है। जरा विचार करें पं. गोविन्द बल्लभ पंत सर्वहितकारी राजनेता थे लेकिन के.सी. पंत एवं इला पंत न तो कांग्रेस की कसौटी पर खरे उतरे न ही भाजपा की। हेमवन्ती नंदन बहुगुणा की विचारधारा उत्तम थी लेकिन उनके दल बदलने का परिणाम यह है कि उनके पुत्र और पुत्री दोनों दल बदल के दलदल में धंस गए। चौ. चरन सिंह उच्च कोटि के राजनेता थे लेकिन उनके पुत्र अजीत सिंह उनकी विरासत को आगे नहीं बढ़ा पाये। कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरु, इन्दिरा गांधी एवं राजीव गांधी के बाद राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष बनते ही एक साल के अन्दर तीन राज्यों पर कब्जा जमा लिया। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव विकास कार्य कराने के लिए 2012 से 17 में एक मिसाल के रुप में जाने जा रहे हैं।
उत्तराखण्ड में विकास के पटरी पर न आने के कई कारण हैं, यहां के राजनेता और ब्यूरोक्रेट्स केवल अपना विकास चाहते हैं राज्य का नहीं। नए राज्य की मांग करने वाले राज्य आन्दोलनकारी आज भी यही चाहते हैं कि यह राज्य उनकी पैत्रिक सम्पत्ति है इस पर उनका कब्जा पुश्तैनी (पीढ़ी दर पीढ़ी) चलता रहे जबकि नए राज्य को प्रोत्साहन देने वाला विशेष राज्य का दर्जा केन्द्र ने समाप्त कर दिया है। व्यवहारिकता भी यही है कि यदि कोई व्यक्ति किसी पुल के निर्माण की मांग करता है और उसकी मांग स्वीकार करते हुए पुल निर्माण को स्वीकृति मिल जाये तो यह आवश्यक नहीं कि पुल निर्माण का ठेका भी उसी व्यक्ति को दिया जाये। इस राज्य में आज तक इसी बात की लड़ाई है यही कारण है कि अब तक सत्ता पर काबिज रहे राजनेताओं में से एक ने भी पहाड़ के विकास की नहीं सोची परिणाम स्वरुप विकास के अभाव में पहाड़ों से बड़ी संख्या में पलायन हुआ जिससे राज्य निर्माण का सपना चकनाचूर हो गया।
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