हरिद्वार। काठ की हांडी एक ही बार चढ़ती है सो चढ़ ली, झूठ और भ्रष्टाचार की आग में इतनी जल गयी कि शायद यह हांडी कभी सत्ता के चूल्हे पर चढ़कर पकवान नहीं बना पायेगी। यह कहावत सिद्ध हुई है पांच राज्यों के सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव परिणामों से जहां की जनता ने भाजपा को नकार कर पुनः कांग्रेस में विश्वास जताया है। 2014 में भाजपा ने लोकसभा का चुनाव भ्रष्टाचार, बेरोजगारी एवं किसानों को राहत देने के नाम पर लड़ा था जिससे मोदी के नाम की एक लहर बनी और उस लहर में नाचने, गाने वाले हों या औने-पौने जिसके नाम के सामने कीचड़ का लाल आ गया वह जीत गया लेकिन जब वादे पूरे नहीं हुए तो मोदी लहर भी समाप्त हो गयी।
देश की जनता को तो मोदी लहर की समाप्ति का पता 11 दिसम्बर 2018 को लगा लेकिन मोदी को स्वयं तथा उनके आका आरएसएस को इस बात का पता यूपी के उपचुनावों से चल गया था। संघ यह समझ गया था कि अब देश की जनता उनका झूठ समझ गयी है और 2019 का चुनाव जीतने के लिए फिर हिन्दू-मुस्लिम दंगा अथवा राम मंदिर का सहारा लिया जाये इस पर भाजपा दो माह पहले से ही कार्य प्रारम्भ कर चुकी है। कई स्थानों पर गायों को काट कर हिन्दू-मुस्लिम कराने की कोशिश की जा चुकी है लेकिन कामयाब नहीं हुए। संघ ने विहिप के माध्यम से अपनी संत मण्डली जिसे भाजपा का भगवा बिग्रेड के नाम से जाना जाता है उसे मंदिर निर्माण के लिए संघर्ष करने का आदेश दे दिया है। कई संत अपने-अपने प्रकार से अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की मांग करने लगे हैं। धर्म संसदों के आयोजन प्रारम्भ हो गए है। धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों ने सत्ता के लिए पहले राम मंदिर को मुद्दा बनाया अब इलाहाबाद में आयोजित हो रहे अर्द्धकुम्भ को ही सत्ता प्राप्ति के लिए समर्पित कर दिया है और ऐसी रणनीति तैयार कर ली गई है कि प्रयाग राज में 2019 में आरम्भ हो रहे अर्द्धकुम्भ मेले का पूरा आयोजन ही 2019 के लोकसभा चुनाव पर फोकस करेगा।
मोदी लहर की हवा निकलनी शुरु हुई थी यूपी के फूलपुर, गोरखपुर कैराना और नूरपुर से लेकिन कम हवा की गाड़ी खिंचते-खिंचते जब राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ पहुंची तो पूरी पंचर हो गयी। संघ पहले ही भांप गया था कि अब मोदी के नाम से 2019 का चुनाव नहीं जीता जा सकता है इसीलिए वह दोबारा राम की शरण में पहुंच गया था। नोटबंदी के बाद भाजपा इतनी बड़ी सम्पन्न पार्टी बन गयी है कि उसके पास अर्थ की कमी नहीं है देश की अर्थव्यववस्था कैसी भी हो? भाजपा पहले मीडिया को खरीद चुकी है अब अर्द्धकुम्भ को ध्यान में रखते हुए उसने संतों को मालामाल करने का मन बना लिया है इसीलिए सभी भाजपाई संत राम मंदिर-राम मंदिर चिलाते फिर रहे हैं और 14 जनवरी 2019 को मकर संक्रांति पर्व के अवसर पर प्रयागराज में बड़ा निर्णय होने की संभावना है क्योंकि केन्द्र और राज्य दोनों में एक ही सरकार है। यह सब राम मंदिर के नाम पर भाजपा द्वारा किया जाने वाला ढकोसला है जो देश के 80 प्रतिशत हिन्दुओं का वोट लेने के लिए किया जा रहा है।
सत्य यह है कि संघ हो या विहिप, संत हों या सरकार अयोध्या में राम मंदिर नहीं बना सकते क्योंकि भूमि के स्वामित्व का मामला न्यायालय में है और दूसरे की भूमि पर कोई भी निर्माण नहीं कर सकता। सरकार अध्यादेश तब ला सकती थी जब भूमि उसकी होती, वह अधिग्रहीत कर सकती थी लेकिन जब सरकार का स्वामित्व नहीं तो अधिग्रहण की कार्यवाही कैसे करेगी? उसमें आयी आपत्तियों का निस्तारण करेगी इसके बाद मुआवजा देगी तब उसका मालिकाना हक बन पायेगा और इस सारी प्रक्रिया में वर्षों का समय लगता है भाजपा यह सब जानते हुए ही इसे साढे चार साल से लटकाये पड़ी थी उसे यदि मंदिर बनवाना होता तो साढ़े चार साल में सारी प्रक्रिया पूर्ण हो गयी होती और मंदिर निर्माण हो गया होता। मोदी ने 2014 के चुनाव पूर्व जो वादे किए थे एक भी पूरा नहीं किया तो मोदी मैजिक खत्म, राम मंदिर नहीं बन पायेगा और मंदिर नहीं तो वोट नहीं, हिन्दू वोट भी कटा, जब मोदी के पास कुछ बचा ही नहीं तो 2019 में विदाई तय।
देश की जनता को तो मोदी लहर की समाप्ति का पता 11 दिसम्बर 2018 को लगा लेकिन मोदी को स्वयं तथा उनके आका आरएसएस को इस बात का पता यूपी के उपचुनावों से चल गया था। संघ यह समझ गया था कि अब देश की जनता उनका झूठ समझ गयी है और 2019 का चुनाव जीतने के लिए फिर हिन्दू-मुस्लिम दंगा अथवा राम मंदिर का सहारा लिया जाये इस पर भाजपा दो माह पहले से ही कार्य प्रारम्भ कर चुकी है। कई स्थानों पर गायों को काट कर हिन्दू-मुस्लिम कराने की कोशिश की जा चुकी है लेकिन कामयाब नहीं हुए। संघ ने विहिप के माध्यम से अपनी संत मण्डली जिसे भाजपा का भगवा बिग्रेड के नाम से जाना जाता है उसे मंदिर निर्माण के लिए संघर्ष करने का आदेश दे दिया है। कई संत अपने-अपने प्रकार से अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की मांग करने लगे हैं। धर्म संसदों के आयोजन प्रारम्भ हो गए है। धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों ने सत्ता के लिए पहले राम मंदिर को मुद्दा बनाया अब इलाहाबाद में आयोजित हो रहे अर्द्धकुम्भ को ही सत्ता प्राप्ति के लिए समर्पित कर दिया है और ऐसी रणनीति तैयार कर ली गई है कि प्रयाग राज में 2019 में आरम्भ हो रहे अर्द्धकुम्भ मेले का पूरा आयोजन ही 2019 के लोकसभा चुनाव पर फोकस करेगा।
मोदी लहर की हवा निकलनी शुरु हुई थी यूपी के फूलपुर, गोरखपुर कैराना और नूरपुर से लेकिन कम हवा की गाड़ी खिंचते-खिंचते जब राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ पहुंची तो पूरी पंचर हो गयी। संघ पहले ही भांप गया था कि अब मोदी के नाम से 2019 का चुनाव नहीं जीता जा सकता है इसीलिए वह दोबारा राम की शरण में पहुंच गया था। नोटबंदी के बाद भाजपा इतनी बड़ी सम्पन्न पार्टी बन गयी है कि उसके पास अर्थ की कमी नहीं है देश की अर्थव्यववस्था कैसी भी हो? भाजपा पहले मीडिया को खरीद चुकी है अब अर्द्धकुम्भ को ध्यान में रखते हुए उसने संतों को मालामाल करने का मन बना लिया है इसीलिए सभी भाजपाई संत राम मंदिर-राम मंदिर चिलाते फिर रहे हैं और 14 जनवरी 2019 को मकर संक्रांति पर्व के अवसर पर प्रयागराज में बड़ा निर्णय होने की संभावना है क्योंकि केन्द्र और राज्य दोनों में एक ही सरकार है। यह सब राम मंदिर के नाम पर भाजपा द्वारा किया जाने वाला ढकोसला है जो देश के 80 प्रतिशत हिन्दुओं का वोट लेने के लिए किया जा रहा है।
सत्य यह है कि संघ हो या विहिप, संत हों या सरकार अयोध्या में राम मंदिर नहीं बना सकते क्योंकि भूमि के स्वामित्व का मामला न्यायालय में है और दूसरे की भूमि पर कोई भी निर्माण नहीं कर सकता। सरकार अध्यादेश तब ला सकती थी जब भूमि उसकी होती, वह अधिग्रहीत कर सकती थी लेकिन जब सरकार का स्वामित्व नहीं तो अधिग्रहण की कार्यवाही कैसे करेगी? उसमें आयी आपत्तियों का निस्तारण करेगी इसके बाद मुआवजा देगी तब उसका मालिकाना हक बन पायेगा और इस सारी प्रक्रिया में वर्षों का समय लगता है भाजपा यह सब जानते हुए ही इसे साढे चार साल से लटकाये पड़ी थी उसे यदि मंदिर बनवाना होता तो साढ़े चार साल में सारी प्रक्रिया पूर्ण हो गयी होती और मंदिर निर्माण हो गया होता। मोदी ने 2014 के चुनाव पूर्व जो वादे किए थे एक भी पूरा नहीं किया तो मोदी मैजिक खत्म, राम मंदिर नहीं बन पायेगा और मंदिर नहीं तो वोट नहीं, हिन्दू वोट भी कटा, जब मोदी के पास कुछ बचा ही नहीं तो 2019 में विदाई तय।
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