हरिद्वार। देश पर कैसे गुजरे पांच साल यह सोचकर भारतमाता की आत्मा कराहने लगी है और चिंतित है कि उसके सूपतों को विकास से भटकाकर बुराई के मार्ग पर ले जाने का जिम्मेदार वह किसको ठहराये। भारत जिस अमजंस के दौर से गुजर रहा है वैसा वातावरण पूरे विश्व के किसी देश में आज तक नहीं बना। अब देश की जनता को इस बात पर भी सोचना होगा कि उसे विकास से किसने भटकाया। चुनावी वातावरण हो या सरकार का संचालन, हमारे राजनेताओं ने अपने शब्दकोष से विकास शब्द ही गायब कर दिया, देश में ऐसा वातावरण बना दिया कि बिना विकास की बात सुने ही जनता मतदान करने लगी तो कैसा होगा देश का भविष्य?
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की तरफ से बिना चुनाव जीते ही घोषित प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने अपनी सभी रैलियों में केवल कांग्रेस की बुराई, कथित भ्रष्टाचार के चर्चे दोहराए और दो-तीन झूठे वादे किए बस जनता ने बम्पर वोट से विजयी बना दिया, परिणाम स्वरुप मोदी सरकार ने साढ़े चार साल तक देश की जनता को तंग करने, कर थोपने, देश की अर्थव्यवस्था कमजोर करने और विकास के मुद्दों से जनता का ध्यान बंटाने के लिए व्यर्थ की बातें बनाने के अलावा कुछ नहीं किया। नतीजा यह निकला कि देश के पांच साल बेकार हो गए और देश की जनता की मेहनत की कमाई के लाखों करोड़ रुपये बर्बाद कर दिए गए, कई लोगों को बड़ी-बड़ी धनराशि लेकर विदेश भगा दिया गया। पांच साल के इस नुकसान की भरपाई दस साल से पहले कोई माई का लाल नहीं कर सकता, दूसरी विडम्बना यह देखे कि पांच राज्यों में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों के सर्वे को यदि सच माने जैसा कि 11 दिसम्बर को परिणाम आ रहे हैं उनमें भी विकास का कोई मुद्दा नहीं था। विधानसभा के चुनाव राज्य के विकास के मुद्दे होते हैं लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव सीधे तौर पर मोदी बनाम राहुल द्वारा की गई एक-दूसरे का बुराई के आधार पर लड़े गए। 2014 में मोदी जी कांग्रेस को बुरा बता लोकसभा का चुनाव जीत गए तो 2018 के विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी ने सीधे-सीधे प्रधानमंत्री की बुराई के आधार पर जीत का डंका बजाया है। जैसे को तैसा मिला, यहां तक तो बात सही। जिसने जैसा किया उसने वैसा फल पाया यह भी सही लेकिन विकास की बात तो दोनों में से एक ने भी नहीं की। हमारे देश की जनता कितनी भोली है कि कभी मंदिर के नाम पर से मतदान कराया जाता वह कर देती, कभी हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर मतदान कराया जाता वह कर देती, तो कभी किसी चार पीढ़ियों के खानदानी नेता को पप्पू बताकर उससे ध्यान हटाया जाता जनता ध्यान हटा लेती है।
बातें बनाकर सत्ता छीनने वालों की बाजीगरी देखें कि हमारे देश के सबसे बड़े प्रदेश में एक जमीन से जुड़े नेता के शिक्षित पुत्र ने जो विश्व के सबसे बड़े राजनैतिक परिवार का उदीयमान नेता है उसने उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में आजादी के बाद से अब तक के सर्वाधिक और सर्वश्रेष्ठ कार्य किए जिससे समाज का प्रत्येक वर्ग लाभान्वित हुआ, किसी वर्ग में निराशा नहीं थी, उस नेता का काम बोलता था इस बातूनी नेता ने वहां भी अपनी करामात दिखा दी। बिहार में विकास पटरी पर था वहां भी बर्बादी का मंजर बना दिया। उत्तराखण्ड में विकास की किरणों स्फुटित होना प्रारम्भ हुईं तो यहां भी दूसरी पार्टी में विभाजन करवा कर अपना वर्चस्व कायम कर लिया क्या आगे भी ऐसे ही देश चलेगा? देश की जनता 2019 का चुनाव विकास के मुद्दे पर जितायेगी या राम मंदिर से संतुष्ट होकर फिर देश के पांच साल बर्बाद करेगी?
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की तरफ से बिना चुनाव जीते ही घोषित प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने अपनी सभी रैलियों में केवल कांग्रेस की बुराई, कथित भ्रष्टाचार के चर्चे दोहराए और दो-तीन झूठे वादे किए बस जनता ने बम्पर वोट से विजयी बना दिया, परिणाम स्वरुप मोदी सरकार ने साढ़े चार साल तक देश की जनता को तंग करने, कर थोपने, देश की अर्थव्यवस्था कमजोर करने और विकास के मुद्दों से जनता का ध्यान बंटाने के लिए व्यर्थ की बातें बनाने के अलावा कुछ नहीं किया। नतीजा यह निकला कि देश के पांच साल बेकार हो गए और देश की जनता की मेहनत की कमाई के लाखों करोड़ रुपये बर्बाद कर दिए गए, कई लोगों को बड़ी-बड़ी धनराशि लेकर विदेश भगा दिया गया। पांच साल के इस नुकसान की भरपाई दस साल से पहले कोई माई का लाल नहीं कर सकता, दूसरी विडम्बना यह देखे कि पांच राज्यों में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों के सर्वे को यदि सच माने जैसा कि 11 दिसम्बर को परिणाम आ रहे हैं उनमें भी विकास का कोई मुद्दा नहीं था। विधानसभा के चुनाव राज्य के विकास के मुद्दे होते हैं लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव सीधे तौर पर मोदी बनाम राहुल द्वारा की गई एक-दूसरे का बुराई के आधार पर लड़े गए। 2014 में मोदी जी कांग्रेस को बुरा बता लोकसभा का चुनाव जीत गए तो 2018 के विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी ने सीधे-सीधे प्रधानमंत्री की बुराई के आधार पर जीत का डंका बजाया है। जैसे को तैसा मिला, यहां तक तो बात सही। जिसने जैसा किया उसने वैसा फल पाया यह भी सही लेकिन विकास की बात तो दोनों में से एक ने भी नहीं की। हमारे देश की जनता कितनी भोली है कि कभी मंदिर के नाम पर से मतदान कराया जाता वह कर देती, कभी हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर मतदान कराया जाता वह कर देती, तो कभी किसी चार पीढ़ियों के खानदानी नेता को पप्पू बताकर उससे ध्यान हटाया जाता जनता ध्यान हटा लेती है।
बातें बनाकर सत्ता छीनने वालों की बाजीगरी देखें कि हमारे देश के सबसे बड़े प्रदेश में एक जमीन से जुड़े नेता के शिक्षित पुत्र ने जो विश्व के सबसे बड़े राजनैतिक परिवार का उदीयमान नेता है उसने उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में आजादी के बाद से अब तक के सर्वाधिक और सर्वश्रेष्ठ कार्य किए जिससे समाज का प्रत्येक वर्ग लाभान्वित हुआ, किसी वर्ग में निराशा नहीं थी, उस नेता का काम बोलता था इस बातूनी नेता ने वहां भी अपनी करामात दिखा दी। बिहार में विकास पटरी पर था वहां भी बर्बादी का मंजर बना दिया। उत्तराखण्ड में विकास की किरणों स्फुटित होना प्रारम्भ हुईं तो यहां भी दूसरी पार्टी में विभाजन करवा कर अपना वर्चस्व कायम कर लिया क्या आगे भी ऐसे ही देश चलेगा? देश की जनता 2019 का चुनाव विकास के मुद्दे पर जितायेगी या राम मंदिर से संतुष्ट होकर फिर देश के पांच साल बर्बाद करेगी?
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