हरिद्वार। भारत में बिकने वाले पेट्रो पदार्थों के दाम समाज में समरसता बनाने के हिसाब से तय किए गए थे, इसी नियम के तहत किसानों के ट्रैक्टर, आम जनता के भार वाहन ट्रक, बस तथा डीजल से चलने वाली ट्रेनों के कारण डीजल के दाम पेट्रोल से कम रखे गए थे। आम जनता एवं किसानों के अधिकारों पर अतिक्रमण करने के लिए ही इस देश के गद्दार उद्योगपतियों ने डीजल से चलने वाली लक्जरी एसी गाड़ियां एवं बिजली न होने पर डीजल से चलने वाले जनरेटर बनाने प्रारम्भ कर दिए। आज पेट्रोल की तुलना में डीजल से चलने वाली गाड़ियों की संख्या अधिक है और इन्हीं लग्जरी गाड़ियां बनाने वाली कम्पनियों ने न्यायलयों में जनहित याचिकाओं के माध्यम से यह आदेश करवा रखे हैं कि वायु प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए डीजल से चलने वाली कोई भी गाड़ी दस साल से अधिक सड़क पर नहीं चलेगी, कितना न्याय संगत है? गाड़ी की कीमत भी कम्पनियां तय करती हैं, गाड़ी का ईंधन भी कम्पनियां तय करती हैं और गाड़ी की उम्र भी कम्पनियां ही तय कराती हैं जो नागरिक पांच लाख से लेकर करोड़ों रुपये कीमत की डीजल से चलने वाली गाड़ी खरीदेगा और दस साल बाद वह गाड़ी आउट डेटेड हो जायेगी तो देश का यह नुकसान किसके खाते में जुड़ेगा?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम जनता का अधिकार सर्वोपरि होता है लेकिन आज हमारे देश में चंद उद्योगपति और पूंजीपति ही देश और सरकार को चला रहे हैं न्यायपालिका में भी कोलेजियम की व्यवस्था है जो किसी व्यवस्था पर वर्ग विशेष के प्रभुत्व का संकेत दे रही है। लोकतंत्र को लोक का तंत्र बनाना होगा और लोकसेवकों को जनता की सेवा के कार्य करने होंगे न कि सरकारी अधिकारी या कर्मचारी की जनता पर तानाशाही चलती रहेगी। देश को लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत चलाने के लिए व्यवस्था को बनाना समय की आवश्यकता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम जनता का अधिकार सर्वोपरि होता है लेकिन आज हमारे देश में चंद उद्योगपति और पूंजीपति ही देश और सरकार को चला रहे हैं न्यायपालिका में भी कोलेजियम की व्यवस्था है जो किसी व्यवस्था पर वर्ग विशेष के प्रभुत्व का संकेत दे रही है। लोकतंत्र को लोक का तंत्र बनाना होगा और लोकसेवकों को जनता की सेवा के कार्य करने होंगे न कि सरकारी अधिकारी या कर्मचारी की जनता पर तानाशाही चलती रहेगी। देश को लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत चलाने के लिए व्यवस्था को बनाना समय की आवश्यकता है।
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