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सत्ता पाना जिसका धर्म हो वही असली राजनेता

हरिद्वार। देश और समाज पर राज करने का नाम राजनीति होता है, जो सबसे कठिन काम है जो राजनेता जीवन भर राजनीति करते हैं उन्हें नया बना नेता कब किनारे लगा दे इसका पूर्वानुमान उन्हें भी नहीं हो पाता है। राजनीति उस जटिल विधा का नाम है जिसमें न दोस्त का पता होता है न ही दुश्मन का। अपना ही नजदीकी मित्र या परिजन कब दुश्मन बन जाये कुछ पता नहीं होता है। राजनीति ही एकमात्र ऐसी विद्या है जिसमें व्यक्ति कभी भी मास्टर नहीं बन पाता और न ही जीवन पर्यन्त किसी पद विशेष पर रह पाता है। किसी व्यक्ति का कोई ऐसा करतब जो सामने वाले के समझ में न आये वही राजनीति और वही जादू होता है। जिस प्रकार जादू की वास्तविकता कुछ और होती है उसी प्रकार राजनीति में हाथी के दांतों की तरह दिखाया कुछ जाता है और किया कुछ जाता है। जिसकी कथनी और करनी में अन्तर नहीं वह नेता नहीं, आजकल के जमाने में सबसे बड़ा नेता वही होता है जो कहे कुछ और करे कुछ। अतीत हमारे देश की राजनीति का गवाह है जितने चाहो प्रमाण मिल जायेंगे। जहां तक राष्ट्रीय राजनीति की बात है तो भारत में मुगलकाल से अब तक यही होता आया है सत्ता इतनी बुरी बला होती है कि इसमें बाप और भाई के रिश्ते भी चूर-चूर हो जाते हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने से पूर्व देश की जनता से जो वादा किया था वह प्रधानमंत्री बनने के बाद पूरा नहीं कर पाये। आन्ध्र प्रदेश में चन्द्रबाबू नायडू ने अपने ससुर से सत्ता कैसे हथियायी किसी से छुपा नहीं है। बिहार में नितीश कुमार ने कभी लालूप्रसाद यादव तो कभी भाजपा से जो हाथ मिलाया उसके पीछे केवल सत्ता का ही खेल था। नरेन्द्र मोदी ने पहले अपने संगठन और बाद में प्रधानमंत्री बनने से पूर्व देश की जनता से जो वादे किए थे एक भी पूरा नहीं किया और अपने वरिष्ठ नेताओं को किनारे लगा दिया। यूपी में मुलायम सिंह यादव ने पहले मायावती के साथ मिलकर सरकार बनायी और बाद में क्या हुआ पूरा देश जानता है। यूपी में सत्ता का स्वाद चखने के बाद अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल सिंह के साथ कैसा बर्ताव किया किसी से छुपा नहीं है। ये नजारे थे राष्ट्रीय राजनीति के। प्रदेश स्तरीय राजनीति में भी ऐसे ही उदाहरण बहुतायत में मिलते हैं।
उत्तराखण्ड में पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी राष्ट्रीय विचारधारा के राजनेता थे लेकिन मुख्यसेवक बनने के बाद उन्हांेने गढ़वाल और कुमायंू तथा ब्राह्मण एवं ठाकुर को किस विचारधारा से देखा, हरीश रावत जैसे मुक्त भोगियों के सीने पर हाथ रखकर देख सकते हैं। यूपी में मायावती ने पहले एक नेता के साथ बहन बनाकर सत्ता की साझेदारी की अब बबुआ के साथ बुआ बनकर सत्ता पाने की साझेदारी कर रही है, बहिन ने भाजपा के साथ भी राखी बांधने से लेकर सत्ता की साझेदारी की। परिणाम जो हो लेकिन सत्य है कि न उन्हें और न इन्हें ठौर। सत्ता की भूख पेट और शरीर दोनों भूखों से बड़ी होती है। सत्ता पाने के लिए नेता किसी भी हद तक जा सकता है, राजनेता का धर्म और ईमान सत्ता है इसके अलावा न उसकी कोई जाति है न ही धर्म। बात राजनीति की हो और स्थानीय स्तर को भुला दिया जाये तो चर्चा अधूरी मानी जायेगी। स्थानीय स्तर पर प्रत्येक शहर और जनपद के परिदृश्य अलग-अलग होते हैं।
स्थानीय स्तर की राजनीति की शुरुआत करते हैं अपने शहर हरिद्वार से जहां भाजपा के नेता तथा राज्य सरकार में नगर विकास मंत्री मदन कौशिक ने वैसे ही पैठ बनायी है जैसी देश में नरेन्द्र मोदी ने पूरे देश की भाजपा अपनी मुठ्ठी में बन्द कर ली तो हरिद्वार में मदन कौशिक का सिक्का चलता है यहां की भाजपा को मजपा के नाम से जाना जाता है। हरिद्वार में वही होता है, वही छपता है और वही चुनाव जीतता है जिसे मदन कौशिक चाहते हैं।

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