महिलाओं ने घर की देहरी लांघ कर पुरुषों की बराबरी प्रारम्भ की और सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र में भागीदारी के बाद अब सरकारी, अर्द्ध सरकारी, राजनीति और व्यापार में भी महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। इस आधी आबादी को कभी अबला के नाम से जाना जाता था यही आधी आबादी मातृशक्ति के नाम से आज जानी और पुकारी जाती है। न्यायपालिका और विधायिका में भी पूरा अधिमान मिल रहा है। सृष्टि का नियम है कि जिसको कमजोर मानकर उसके उत्थान के नियम बना दिए जाते हैं तभी उन नियमों का उल्लंघन शुरु हो जाता है यह उल्लंघन या कहें कि नियम कानूनों का दुरुपयोग कौन करता हैे और इसके क्या दुष्परिणाम होते हैं आज पुरुष समाज जिसे कभी पुरुष प्रधान समाज के नाम से जाना जाता था वह आज शोषित समाज बनकर उभर रहा है और जिस मातृशक्ति कभी शालीनता के लिए सम्मान होता था वह आज गिरी दृष्टि से देखी जाने लगी है। आज समाज की यह धारणा बनती जा रही है कि स्त्री जाति का कोई भरोसा नहीं कब किस पर क्या आरोप लगा दे। यह विचारधारा कोई मनगढ़त नहीं बल्कि व्यवहार के अनुकूल है। महिला उत्पीड़न के अब तक संत, राजनेता, सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारियों के साथ ही सार्वजनिक जीवन में जितने आरोप अब तक महिलाओं द्वारा पुरुषों पर लगाये गए उनमें सभी पुराने हैं कोई घटना नई क्यों नहीं उजागर होती? कोई कहती है अमुक व्यक्ति उसका छः माह से शारीरिक शोषण कर रहा था, कोई कहती कि पांच साल और कोई-कोई तो 10-15 वर्षों से अपने शोषण का खुलासा करती है। इस देश में कोई पूछने वाला है कि वह पीड़ित महिला चार माह से लेकर 15 वर्षों तक अपना शोषण करवाती रही और बोली नहीं यदि वह 10-15 वर्षों तक सहनशील बनी रही तो उसने अब अपनी जुबान क्यों खोली?
इन मामलों में सच्चाई क्या होती है यह सब जानते हैं, न्यायपालिका भी जानती है, पुलिस भी जानती है, पत्रकार भी जानते हैं, उद्योगपति, राजनेता और संत सब जानते हैं क्योंकि सभी भुक्तभोगी हैं लेकिन कोई मुंह नहीं खोलता यह देश, समाज और संविधान का अपमान है। देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि इसे झूठ के आधार पर चलाया जा रहा है कानून की धज्जियां उड़ायी जा रही हैं, सत्य को छुपा कर असत्य के आधार पर निर्णय लिए जा रहे हैं। आधी आबादी के झूठे आरोपों के आधार पर शेष आधी आबादी को बदनाम किया जा रहा है, कई संत, कई राजनेता, व्यापारी, उद्योगपति और कई पति झूठे आरोपों में अपनी प्रतिष्ठा, इज्जत आबरु खोकर जेल की हवा खा रहे हैं और सरकार मी टू जैसे नियम कानून बना रही है। किसी में सत्य का रहस्योद्घाटन करने की सामर्थ्य नहीं रह गयी है। यह कोई नियम कानून नहीं है जिसने महिलाओं के सम्मान को ही समाप्त कर दिया है, इस नियम को लागू करवाकर मातृ शक्ति अपनी पीठ न थपथपाये बल्कि अब तक खुलासा हुई घटनाओं के आधार पर इन सभी घटनाओं के लिए महिलाओं को ही दोषी माना जा रहा है कि महिलाओं ने अपना प्रतिव्रता वाला नियम भंग कर दिया है और वे विदेशी सभ्यता की तर्ज पर मन चाहे मजे लेती हैं तथा जब किसी पुरुष से मन भर जाता है या वह उनकी अपेक्षायें पूर्ण नहीं कर पाता है तभी उस पर यौन शोषण का आरोप लगा दिया जाता है।
एक जमाना था जब भारत अपनी संस्कृति के लिए विश्व में विख्यात था आज अपनी मातृशक्ति के आरोपों से शर्मिन्दा होकर संसार में कुख्यात हो रहा है। किसी देश, समाज और परिवार की इज्जत बनाने में पुरुषों को वर्षों का समय लगता है उसी परिवार की इज्जत को एक महिला एक दिन में चौपट कर देती है, बदनामी देश, धर्म, समाज, परिवार और पुरुष की होती है आज भी उस चरित्रहीन महिला के आचरण के विरुद्ध कोई मुंह नहीं खोलता जो अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए वर्षों तक एक पुरुष के वैभव, पौरुष और मान-सम्मान का उपयोग करती है और जब वह पुरुष किसी मामले में असमर्थता व्यक्त करता है तो उसे बदनाम कर देती है। मातृशक्ति का सम्मान सर्वोपरि है मैं भी अपनी मातृशक्ति का दिल से सम्मान करता हूं लेकिन पत्रकार होने के नाते मानव जाति का शोषण अब देखा नहीं जाता, देश और समाज को बचाना है तो सत्य को समर्थ बनाना होगा अन्यथा झूठे आरोप देश और समाज की इज्जत को बर्बाद कर देंगे।
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