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राम मंदिर का निर्माण देश और समाज की आवश्यकता?

हरिद्वार। जब धर्म का राजनीतिकरण हो जाये धर्म का प्रचार करने वाले संतवेषधारी दुष्कर्म के आरोपों में जेल जाने लगें तब धर्म के ठेकेदारों से धर्म को बचाने के लिए राजनेता या वर्ग विशेष को नहीं बल्कि जनता को पहल करनी चाहिए तथा धर्म की दुहाई देकर वोट मांगने वालों को सिरे से नकार देना चाहिए। जब-जब लोकसभा के चुनाव आते हैं एक पार्टी विशेष तथा उससे जुड़े भगवाधारी मंदिर-मंदिर की चिल्लपों मचाना प्रारम्भ कर देते हैं जबकि देश की जनता जानती है कि मंदिर निर्माण देश और समाज की मूल आवश्यकता नहीं है फिर भी जनता बार-बार इसी मुद्दे पर गुमराह होती रही है। जनता को व्यर्थ के मुद्दों पर भटकाने का काम बुद्धि एवं विवेक विहीन मीडया करती है।
मीडिया प्रचार का माध्यम होता है पक्ष नहीं इस नियम का पालन प्रिंट मीडिया तब तक करता रहा जब तक वह बुद्धिजीवियों के पास रहा, आजकल प्रिंट मीडिया पर पंूजीपतियों का कब्जा है जो समाज को सद्गति देने वाले समाचारों के स्थान पर समाचार-पत्रों के माध्यम से समाज को समाचारों के स्थान पर विज्ञापन पढ़ने के लिए बाध्य करते हैं यह जनता के मूल अधिकारों का हनन है क्योंकि जनता समाचार पढ़ने के लिए अखबार खरीदती है विज्ञापन पढ़ने के लिए नहीं। पत्रकारिता का दामन दागदार बनाने में रही सही कसर इलैक्ट्रानिक मीडिया ने पूरी कर दी। यही बुद्धि और विवेकहीन मीडियाकर्मी जेलों की शोभा बढ़ा रहे हैं कोई स्टिंग में जेल जाता है तो कोई ब्लैकमेलिंग करने में। देश और समाज के लिए सराहनीय कार्य करने के लिए आज तक इनमें से किसी को सम्मानित नहीं किया गया अलबत्ता फर्जी संस्थायें बनाकर ये लोग स्वयं सम्मानित हो लें यह अलग की बात है।
पूरा देश ही नहीं बल्कि समूचा विश्व जानता है कि राम मंदिर का निर्माण न तो देश की आवश्यकता है न ही समाज की, न ही किसी धर्म की। किसी भी विवादित स्थल पर इबादत की अनुमति किसी मजहब में नहीं है। भगवान किसी मंदिर में न होकर इंसान के मन और अर्न्तआत्मा में होते हैं। आज कितने लोग मंदिर और मस्जिद में जाते हैं? यदि जाते भी हैं तो देश में मंदिरों की कमी नहीं है और तीर्थस्थलों में तो सैकड़ों नहीं हजारों की संख्या में मंदिर मिल जायेंगे। प्रत्येक परिवार अपने घर में भी पूजाघर अलग से बनाता है इसके बाद भी मंदिर-मंदिर चिल्लाना देश की जनता को धर्म के नाम पर बरगलाने और उसकी धार्मिक भावनायें भड़काकर वोट की राजनीति करने के अलावा कुछ नहीं है। विडम्बना यह है कि हमारे देश के साधु संत भी राजनेताओं के इशारे पर नाचने लगते हैं वे अपने-अपने धर्मस्थलों की मर्यादा पर ध्यान न देकर अयोध्या के विवादित स्थल पर मंदिर बनाने के लिए धरने प्रदर्शन और तरह-तरह की धमकी भरी बयानबाजी करने लगते हैं। कुछ राजनेताओं का काम जनता को बेवकूफ बनाना होता है और वे कई बार अपने मकसद में कामयाब भी हो चुके हैं क्योंकि जनता पता नहीं किन स्कूलों में शिक्षित है उसे भारत के संविधान और संसदीय प्रणाली का ज्ञान नहीं है। सरकार-सरकार होती है वह जो चाहे कर सकती है सरकार के लिए कोई कार्य मुश्किल नहीं होता है वह किसी भी मामले पर अध्यादेश लाकर उसे पूर्ण कर सकती है। सरकार जब नोटबंदी, जीएसटी और तीन तलाक पर अध्यादेश ला सकती है तो राम मंदिर पर क्यों नहीं लाती? सरकार जनता को कभी बेवकूफ बनाती है जब वह बनने के लिए तैयार होती है। बनते रहो भावी पीढ़ी तुम से पूछेगी।

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