हरिद्वार। सनातन धर्म के पर्व हों या भारतीय सभ्यता की परम्परायें दोनों के विरोध में वैज्ञानिकों के मत और जनहित याचिकायें आती रहती हैं। उन याचिकाओं को स्वीकृत भी किया जाता है उन पर निर्णय भी होते हैं। हमारे वैज्ञानिक भी तरह-तरह की खोजें करते रहते हैं उनके मत भी कुछ ऐसे ही होते हैं जैसे जनहित याचिकाओं के निर्णय। सनातन धर्म के पर्वों में चाहे होली हो या दीपावली अथवा श्रावण मास का कांवड़ मेला सभी पर वैज्ञानिकों के शोध और जनहित याचिकाओं के निर्णय आते हैं और मीडिया भी उन्हें प्राथमिकता के आधार पर प्रकाशित करती है। विडम्बना यह है कि हमारे धर्मगुरुओं के उपदेश, भागवत कथा तथा रामकथा इत्यादि के प्रसारण का शुल्क इलैक्ट्रोनिक मीडिया का प्रतिघंटा लाखों में होता है लेकिन कांवड़ मेले में डीजे बजाना हो, होली पर रंग खेलना हो या दीपावली पर पटाखे चलाने पर हमारे संतों के बयान निशुल्क प्रकाशित और प्रसारित होते हैं। संत भी सहर्ष बयान दे देते हैं और समाचार पत्रों में अपने रंगीन फोटो के साथ छपे बयान पर खूब वाहवाही लूटते हैं, ऐसे ही होगी धर्म की जय?
दो-तीन वर्षों में दीपावली पर पटाखे न चलाने के लिए वायुमण्डल में प्रदूषण का बहुत बड़ा भूत खड़ा कर दिया जाता है कि दिल्ली का दम घुट रहा है, हरियाणा के किसान पराली जला रहे हैं लेकिन किस रिफाइनरी और उद्योग या चीनी मिल से कितना धुंआ प्रतिदिन छूट रहा है किसी वैज्ञानिक की निगाह वहां तक नहीं पहुंचती, हां चार पहिया वाहन निर्माण करने वाली कम्पनियों की जब गाड़ियां बिकनी बंद हो जाता है तो बकायदा जनहित याचिका पर निर्णय आ जाता है कि दस साल पुरानी डीजल और 15 साल पुरानी पेट्रोल की गाड़ियां अब नहीं चलेगी इनसे प्रदूषण फैलता है। अन्धाधुन्ध छायादार और प्रदूषण नियंत्रण के लिए उपयोगी पेड़ कट रहे हैं इन पर न कोई प्रतिबंध और न ही पेड़ कटवाने के जिम्मेदार किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध कोई कार्यवाही, इस तरफ न तो किसी वैज्ञानिक का शोध हो रहा है न ही किसी की जनहित याचिका पर कोई निर्णय आ रहा। यदि किसी मंदिर में बलि होती है तो बलि प्रथा के विरोध में न्यायालय का निर्णय आ जाता है और कुर्बानी हो तो वह धार्मिक कार्य है धर्म में न्याय का हस्तक्षेप नहीं होता है।
किसान की पराली जलती है तो वायुमण्डल में प्रदूषण फैलता है और ईंट-भट्टों की चिमनी, शुगर मिल की चिमनी और गन्दा पानी निकलने से जो गंध फैलती है उससे वायमुण्डल पवित्र होता है। किसी शहर में डीजल के टैम्पो धुंआधार करते हैं तो उससे पुलिस और सरकार को राजस्व प्राप्ति होती है वहीं यदि बैटरी रिक्शा चलते है तो सरकार को बहुत बड़ी राजस्व हानि हो जाती है। दीपावली पर मिट्टी के दीपक की जगह-जगह चायनीज लड़ियां जलती हैं तो शहर और भवनों की शोभा बढ़ती है लेकिन जिन पटाखों में गंधक की महक से मच्छर और बरसात के कीड़े तथा दूषित वायु समाप्त हो जाती है उनसे प्रदूषण फैलता है क्योंकि दीपावली की रोशनी और पटाखों से बरसाती कीड़ों के समाप्त हो जाने से बरसाती बीमारियां डेंगू, मियादी बुखार, वायरल तथा स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियां समाप्त हो जाती हैं तो डॉक्टरों की दूकानों पर मरीजों की भीड़ कम हो जाती है इसीलिए तेल के दीपों और पटाखों से प्रदूषण फैलता है पहले हमारे पूर्वज कहते थे बरसाती कीड़े-मकोड़ों और मच्छर दीपावली का दीपक चाट कर मर जाते हैं। इसीलिए तेल के दीपक के स्थान पर मोमबत्ती और अब बिजली की सजावट चालू की गई है।
हमारे वैज्ञानिक यदि ऐसे ही शोध करते रहे तो हरिद्वार में भी गंगा जल आचमन के योग्य नहीं रहेगा, श्रद्धालु गंगास्नान करना बंद कर देंगे जिस प्रकार होली पर रंग खेलने वाला युवा शराब की बोतलों में व्यस्त हो जाते हैं उसी प्रकार गंगा और गंगाजल का नाम लेना लोग भूल जायंेगे फिर इन धर्मस्थलों और तीर्थस्थलों पर कौन आयेगा कांवड़ मेले में जल भरने? धर्मगुरु राजनेताओं की कठपुतली बन रहे हैं। नेताओं की मर्जी से ही धार्मिक आयोजन होते हैं और जिस धार्मिक आयोजन में कोई नेता नहीं आता उसे संत ही अधूरा मानते हैं। आज के संत धर्म से अधिक धन को महत्व देते हैं इसीलिए धार्मिक पर्वों का स्वरुप बदल रहा है। एक दशक बाद यहां क्या होने वाला है उसके कुछ अंश आगामी लेख में अवश्य पढ़ें।
दो-तीन वर्षों में दीपावली पर पटाखे न चलाने के लिए वायुमण्डल में प्रदूषण का बहुत बड़ा भूत खड़ा कर दिया जाता है कि दिल्ली का दम घुट रहा है, हरियाणा के किसान पराली जला रहे हैं लेकिन किस रिफाइनरी और उद्योग या चीनी मिल से कितना धुंआ प्रतिदिन छूट रहा है किसी वैज्ञानिक की निगाह वहां तक नहीं पहुंचती, हां चार पहिया वाहन निर्माण करने वाली कम्पनियों की जब गाड़ियां बिकनी बंद हो जाता है तो बकायदा जनहित याचिका पर निर्णय आ जाता है कि दस साल पुरानी डीजल और 15 साल पुरानी पेट्रोल की गाड़ियां अब नहीं चलेगी इनसे प्रदूषण फैलता है। अन्धाधुन्ध छायादार और प्रदूषण नियंत्रण के लिए उपयोगी पेड़ कट रहे हैं इन पर न कोई प्रतिबंध और न ही पेड़ कटवाने के जिम्मेदार किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध कोई कार्यवाही, इस तरफ न तो किसी वैज्ञानिक का शोध हो रहा है न ही किसी की जनहित याचिका पर कोई निर्णय आ रहा। यदि किसी मंदिर में बलि होती है तो बलि प्रथा के विरोध में न्यायालय का निर्णय आ जाता है और कुर्बानी हो तो वह धार्मिक कार्य है धर्म में न्याय का हस्तक्षेप नहीं होता है।
किसान की पराली जलती है तो वायुमण्डल में प्रदूषण फैलता है और ईंट-भट्टों की चिमनी, शुगर मिल की चिमनी और गन्दा पानी निकलने से जो गंध फैलती है उससे वायमुण्डल पवित्र होता है। किसी शहर में डीजल के टैम्पो धुंआधार करते हैं तो उससे पुलिस और सरकार को राजस्व प्राप्ति होती है वहीं यदि बैटरी रिक्शा चलते है तो सरकार को बहुत बड़ी राजस्व हानि हो जाती है। दीपावली पर मिट्टी के दीपक की जगह-जगह चायनीज लड़ियां जलती हैं तो शहर और भवनों की शोभा बढ़ती है लेकिन जिन पटाखों में गंधक की महक से मच्छर और बरसात के कीड़े तथा दूषित वायु समाप्त हो जाती है उनसे प्रदूषण फैलता है क्योंकि दीपावली की रोशनी और पटाखों से बरसाती कीड़ों के समाप्त हो जाने से बरसाती बीमारियां डेंगू, मियादी बुखार, वायरल तथा स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियां समाप्त हो जाती हैं तो डॉक्टरों की दूकानों पर मरीजों की भीड़ कम हो जाती है इसीलिए तेल के दीपों और पटाखों से प्रदूषण फैलता है पहले हमारे पूर्वज कहते थे बरसाती कीड़े-मकोड़ों और मच्छर दीपावली का दीपक चाट कर मर जाते हैं। इसीलिए तेल के दीपक के स्थान पर मोमबत्ती और अब बिजली की सजावट चालू की गई है।
हमारे वैज्ञानिक यदि ऐसे ही शोध करते रहे तो हरिद्वार में भी गंगा जल आचमन के योग्य नहीं रहेगा, श्रद्धालु गंगास्नान करना बंद कर देंगे जिस प्रकार होली पर रंग खेलने वाला युवा शराब की बोतलों में व्यस्त हो जाते हैं उसी प्रकार गंगा और गंगाजल का नाम लेना लोग भूल जायंेगे फिर इन धर्मस्थलों और तीर्थस्थलों पर कौन आयेगा कांवड़ मेले में जल भरने? धर्मगुरु राजनेताओं की कठपुतली बन रहे हैं। नेताओं की मर्जी से ही धार्मिक आयोजन होते हैं और जिस धार्मिक आयोजन में कोई नेता नहीं आता उसे संत ही अधूरा मानते हैं। आज के संत धर्म से अधिक धन को महत्व देते हैं इसीलिए धार्मिक पर्वों का स्वरुप बदल रहा है। एक दशक बाद यहां क्या होने वाला है उसके कुछ अंश आगामी लेख में अवश्य पढ़ें।
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