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निकाय चुनावों ने किया उत्तराखण्ड में अहंकार का पतन

      उत्तराखण्ड राज्य में सम्पन्न हुए चौथे स्थानीय निकाय चुनाव के परिणामों ने राज्य की सत्ता पर 18 वर्ष तक काबिज रही भाजपा-कांग्रेस को आयना दिखाने का काम किया है लेकिन इस राज्य का दुर्भाग्य है कि दो दशक पूर्णता की ओर हैं लेकिन किसी तीसरे क्षेत्रीय दल का उदय नहीं हो पाया जो राज्य की दुर्दशा का कारण बना हुआ है। हमारे देश का इतिहास बताता है कि किसी भी राज्य का विकास तब तक नहीं हुआ जब तक वहां किसी क्षेत्रीय दल की सरकार नहीं बनी क्योंकि भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों की राजसत्ता का संचालन दिल्ली में बैठी उनकी आला कमान के आदेशानुसार होता है। दोनों ही दलों में नेताओं का इतना बड़ा दलदल है कि जब एक नेता कुर्सी पर बैठता है तो उसी दल का दूसरा नेता दिल्ली जाकर उसकी कुर्सी का पाया हिलाकर उसको हटवा देता है और मुगलकालीन संस्कृति के अनुरुप स्वयं कब्जा कर लेता है। कांग्रेस की सत्ता के दौरान उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही हुआ था जैसा उत्तराखण्ड में अब हो रहा है। जिस प्रदेश में सरकार और उसके मुखिया का ही कोई भविष्य या स्थायित्व नहीं रहा तो उस राज्य के विकास की कामना ही नहीं करनी चाहिए।
जिस प्रकार उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा ने विकास की बुनियाद रखी आंध्र प्रदेश में चन्द्राबाबू नायडू ने, तमिलनाडू में जयललिता ने और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने जनता को राहत का एहसास दिलाया उसी प्रकार उत्तराखण्ड में भी जब कभी किसी क्षेत्रीय दल की सरकार बनेगी तभी नया राज्य बनने का सपना साकार हो सकेगा। उत्तराखण्ड राज्य निर्माण की घोषणा से लेकर पहला शपथ ग्रहण समारोह सबकुछ रात के अंधेरे में हुआ था यही कारण है कि राज्य से भ्रष्टाचार, असमानता, वैमनस्य तथा क्षेत्रवाद रुपी अंधकार दूर नहीं हो रहा है। उत्तराखण्ड में भाजपा तथा कांग्रेस दोनों ही दल क्रमशः सत्ता सुख का आनन्द ले रहे हैं तथा दोनों दलों में एक गुप्त समझौता प्रतीत हो रहा है कि जो भी दल सत्ता में होता है वह निर्दलीय अथवा तीसरे दल के जो भी एक दो विधायक जीतते हैं उनको मंत्री पद देकर उस पार्टी का वुजूद समाप्त कर देते हैं क्योंकि जब भी कोई नया राज्य बनता है तो वहां की जनता, नेता तथा अधिकारी सभी मिलकर स्वयं का ही भला चाहते हैं नेता न पार्टी का भला चाहता है न ही राज्य का वह बस इतना ही चाहता है कि स्वयं मालामाल हो जाये यही धारणा इस राज्य के साथ भी रही। इसी सप्ताह सम्पन्न हुए स्थानीय निकाय चुनावों में जनता ने यह महसूस किया कि राज्य का विकास करना है तो किसी तीसरे क्षेत्रीय दल को विकल्प के तौर पर लाना ही होगा और जिन-जिन क्षेत्रों में जनता राज्य के असरदार नेताओं से नाराज थी वहां विकल्प के अभाव में विपरीत दल के पक्ष में मताधिकार का प्रयोग किया उसमें चाहे देहरादून, हरिद्वार, कोटद्वार हो या हल्द्वानी। जिस डबल इंजन वाली सरकार का विधानसभा चुनाव से पूर्व प्रधानमंत्री ने अच्छा कार्य करने का वास्ता दिया था उसके दोनों इंजन एक साल में ही फेल हो गए राज्य की जनता के ऊपर एक साल में ही कर्ज का भार डेढ़ गुना हो गया है। राज्य में पहली ऐसी सरकार है जो निरंकुश नौकरशाही से काम लेने में असमर्थ रहने के कारण अपना सत्ता रुपी बलिदान देकर जनता के समक्ष प्रायश्चित करेगी। जो कांग्रेस आगामी विधानसभा अथवा लोकसभा चुनाव में अपनी बारी का इंतजार कर रही है उसे अपनी करनी का फल भुगतना पड़ेगा क्योंकि उत्तराखण्ड की दुर्दशा देखकर अब कई राजनैतिक दलों ने राज्य में सक्रियता का मन बना लिया है।

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