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देश और समाज को बचाने के लिए धार्मिक पर्वों का संरक्षण जरुरी

हरिद्वार। सनातन धर्म पर्वों का ऐसा गुलदस्ता है जो अपनी सामयिक परिस्थितियों के अनुरुप समाज में संस्कार और संस्कृति के साथ ही स्वस्थ जीवन का समावेश करता है यही कारण है कि सनातन धर्म के सापेक्ष आचरण करने वाले सुखी, स्वस्थ एवं चिरायु होते हैं इसीलिए हमारे ऋषि मुनियों के लम्बे जीवन और उपदेश आज भी प्रासंगिक हैं। दीपावली सनातन धर्म का सबसे बड़ा एवं महत्वपूर्ण पर्व है जो पांच दिन तक चलता है और इस वर्ष यह पर्व 5 नवम्बर से 9 नवम्बर तक मनाया जायेगा। हमारे ऋषि मुनियों ने इस महान पर्व की संरचना ही कुछ इस प्रकार की कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति सुख, समृद्धि, शांति एवं सद्भाव का एहसास कर सके इसीलिए इस महापर्व को लक्ष्मी पूजा के रुप में प्रधानता प्रदान की गई है जिसकी तैयारियां दो माह पूर्व से ही शुरु हो जाती हैं। घरों की रंगाई-पुताई, पुरानी वस्तुओं को हटाकर नए सामानों से घर को सजाना, एक-दूसरे को उपहार देकर सामाजिक सद्भाव का वातवरण तैयार करना तथा गोवर्धन पूजा के साथ ही भाई-बहन के रिश्तों की प्रगाढ़ता का पर्व भैया दूज के साथ पांच दिन तक चलने वाला यह पर्व न केवल अपने धर्म बल्कि दूसरे धर्म के अनुयायियों के चेहरों पर भी मुस्कान बिखेरता है।
धर्म-धर्म होता है और अधर्म-अधर्म होता है अच्छाई का फल अच्छा होता है तथा बुराई का परिणाम बुरा होता है धर्म कोई भी हो बुरा नहीं होता, धर्मों को मानने के रास्ते अलग हो सकते हैं लेकिन मंजिल सभी की एक होती है। एक जमाना था कि किसी की किसी से प्रतिद्वन्दता नहीं थी सभी एक दूसरे का सम्मान करते थे आज एक-दूसरे को नीचा दिखाकर स्वयं को श्रेष्ठ समझने की होड़ लग गयी है।
विडम्बना यह है कि आज धर्म को व्यापार और राजनीति से जोड़ दिया गया है इसीलिए धर्म की हानि हो रही है यह हानि धर्म की नहीं बल्कि देश और समाज की हानि है। कुछ राजनैतिक दल धर्म के नाम पर राजनीति कर रहे हैं तो कुछ संत धर्म के नाम पर व्यापार कर हैं, धर्म का लबादा ओढ़कर अधर्म कर रहे हैं। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने धर्म को हानि पहुंचाने का प्रयास किया उनकी दुगर्ति हुई। सनातन धर्म की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि यह धर्म न कभी कमजोर हुआ और न भविष्य में कभी कमजोर होगा क्योंकि यह सत्य, सदाचार एवं परोपकार पर आधारित है इसमें कोई संकीर्णता नहीं सम्पूर्ण विश्व का कल्याण चाहता है इसीलिए इसकी हस्ती कभी मिट नहीं सकती।
एक जमाना था जब व्यापार को धर्म की तरह चलाया जाता था किसी पदार्थ में कोई मिलावट नहीं थी, न घटतौली थी और न ही कई गुना मुनाफा लिया जाता था। आज धर्म को दुकान की तरह चलाया जाता है मंदिर के नाम पर राजनीति की जाती है और मंदिर में पूजा करने की दर सूची लगायी जाती है योग और आयुर्वेद को बेचा जा रहा है जो हमारे ऋषि मुनियों की परम्परा है, जरा सोचो जो देश अपने ऋषि मुनियों की परम्परा ही बेच रहा हो वह देश का हितैषी कैसे हो सकता है और जिसने भगवान श्रीराम के मंदिर को ही अपनी राजनीति और सत्ता प्राप्ति का आधार बना लिया हो या धार्मिक वर्गीकरण को अपनी सत्ता प्राप्ति का केन्द्र बिन्दु बनाया हो वह देश और समाज का हितैषी कैसे हो सकता है? इन्हीं स्वार्थी तत्वों ने अपने स्वार्थ के लिए हमारे पर्वों तथा धर्म का स्वरुप बदला है। यदि हमे अपने धर्म, संस्कृति एवं ऋषि मुनियों की परम्परा को जीवित रखना है तो धर्म के इन दुश्मनों का सफाया करना होगा।

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