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सत्ता प्राप्ति हेतु सम्पत्ति और शराब का सहारा

हरिद्वार। सत्ता प्राप्त करना अब सस्ता काम नहीं रह गया है सत्ता चाहे केन्द्र की हो राज्य हो या स्थानीय निकाय की पैसे का खेल हो गया है और सत्ता प्राप्ति के लिए शराब का चलन सबसे बड़ा कलंक है। उत्तराखण्ड में सम्पन्न होने जा रहे स्थानीय निकाय चुनाव अब अन्तिम चरण में हैं लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि जिस हरिद्वार को मांस-मदिरा के लिए प्रतिबंधित किया गया है और जिस नगरपालिका ने यह बायलाज बनाया है उसी को संचालित करने के लिए चयनित होने के बदले मां गंगा की धारा के समान्तर शराब की नदियां बहा रहे हैं। नेता शराब पिला रहे, जनता शराब पी रही और पुलिस तथा प्रशासन मूकदर्शक बने हुए हैं तो लोकतंत्र का चौथा खम्भा भी खम्बा लेकर आंखें बन्द किए हुए है।
हरिद्वार के राजनेताओं ने नैतिक पतन की पराकाष्ठा को पार कर दिया है। धर्मस्थल से धर्म और संस्कृति को समाप्त कर अवैध शराब का कारोबार कराया जा रहा है जिससे युवा पीढ़ी बर्बाद हो रही है। हमारे राज्य के नगर विकास मंत्री भी इसी धर्मनगरी के निवासी हैं और हरिद्वार में नगर निगम का बोर्ड भी उन्हीं के नेतृत्व में उन्हीं की पार्टी का गठित हुआ था, उस नगरनिगम बोर्ड के कार्यकाल में नगरपालिका ;अब नगरनिगमद्ध बायलाज का खुला उल्लंघन हुआ और शराब के ठेकों को पुराने स्थानों से समाप्त कर नगर निगम सीमा के पास ही स्थापित करवा दिया गया जो नगर पालिका बायलाज और तीर्थस्थल की मर्यादा के विरुद्ध है।
ऐसा कुकृत्य करने का दुःसाहस किस सरकार और किस बोर्ड के कार्यकाल में हुआ इसे अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ है और वे ही धर्मद्रोही नेता तथा उनकी पार्टी स्थानीय चुनाव में जीत की दावेदारी कर रहे हैं। जनता क्या निर्णय लेगी इसका परिणाम 20 नवम्बर को आयेगा।
आगामी 20 नवम्बर को यह स्पष्ट हो जायेगा कि इस धर्मनगरी की जनता इस देवभूमि के द्वार पर धर्म और संस्कृति का संरक्षण करने की हिमायती है या धर्मनगरी को अधर्म एवं अनैतिक कृत्यों के लिए विख्यात करना चाहती है वर्तमान चुनाव जनता के धर्म एवं संस्कृति से जुड़ने या उसे समाप्त करने की परीक्षा के रुप में परिणाम देंगे।
इन चुनावों से यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि धर्मनगरी की दशा सुधारने या बिगाड़ने का दोष किसका है जनता का, राजनेताओं का या नौकरशाही का अथवा मीडिया की मौन स्वीकृति का।

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