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सामाजिक एकता में सबसे बड़ा बाधक है जातिवाद का जहर

हरिद्वार। किसी प्रकार का वाद चाहे वह जातिवाद हो या क्षेत्रवाद, धर्मवाद हो नक्सलवाद अथवा आतंकवाद हो, वाद-विवाद सभी व्यक्ति और समाज की बर्बादी तथा सामजिक एकता में बाधक हैं लेकिन विडम्बना यह है कि इन सभी वादों के जनक भी हम ही हैं। एक धर्म दूसरे धर्म की आलोचना करता है एक पार्टी दूसरी पार्टी की आलोचना करती है तो एक जाति दूसरी जाति की आलोचना करती है। यह सभी आलोचनायें पीठ पीछे की बातंे हैं आमने-सामने कोई किसी की आलोचना नहीं करता और जो आमने-सामने आलोचना होती है उसे ही वाद-विवाद कहते हैं, जिसमें लड़ाई होने की सभी संभावनायें प्रबल हो जाती हैं।
आज का इंसान धर्म और इंसानियत के मार्ग से भटक गया है न कोई धर्म बुरा है न ही कोई जाति सामने कोई किसी को बुरा नहीं कहता जबकि पीछे कोई किसी की प्रशंसा नहीं करता और जो शब्द प्रयोग करता वे निहायत भद्दे हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म की प्रशंसा एवं प्रचार करने का अधिकार है। धर्म सभी अच्छे होते हैं उनके मानने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन मंजिल सभी की एक है, उद्देश्य सभी के उत्तम हैं। वर्तमान समाज को हम सबने मिलकर विसंगति प्रधान बनाया है तो इन विसंगतियों को दूर करना भी हम सबका ही कर्तव्य है, मेरा सभी धर्म और जाति के लोगों से निवेदन है कि समाज में प्रचलित कुरीतियां, विसंगतियां और गलत संबोधन को भुलाकर उत्तम भाईचारे वाले समाज का निर्माण करें क्योंकि भगवान ने इंसान बनाया है उसने न कोई धर्म बनाया न ही जाति उसने तो सम्पूर्ण सृष्टि का ही निर्माण किया है मानव ने ही इस सृष्टि को देशों में बांटा जो आपसी प्रतिद्वंदता के शिकार हैं। हर इंसान को भगवान ने बनाया है और इंसान भी भगवान का ही अंश तथा आत्मा परमात्मा की एक इकाई है। व्यक्ति यदि अपना खान-पान, रहन-सहन और दिनचर्या सुधार ले तो सदैव स्वस्थ तथा चिरायु हो जाये व्यक्ति यदि अपनी जुबान को नियंत्रित/संयमित और मधुरता से परिपूर्ण कर ले तो उसकी कभी किसी से शत्रुता न हो, समाज से आलोचना शब्द गायब हो जाये तो भारत की संस्कृति विश्व में सर्वोपरि हो जाये। कहते हैं समाज पर कलियुग का प्रभाव है इसलिए कोई किसी की प्रशंसा नहीं करता तो व्यक्ति को अपनी प्रशंसा स्वयं करनी पड़ती है और जब हम अपनी प्रशंसा स्वयं करते हैं तो दूसरे की तुलना में स्वयं को श्रेष्ठ बताने के लिए दूसरे धर्म और जाति को गलत संबोधन देते हैं यही समाज की सबसे बड़ी विसंगति है। सम्पूर्ण समाज धर्म एवं जाति के लोगों से क्षमा याचना करते हुए मैं उन विसंगतियों का वर्णन कर रहा हूं जिन्हें समाप्त कर दिया जाये तो राष्ट्रीय एकता इतनी मजबूत हो जायेगी कि भारत को स्वतः ही विश्व गुरु का दर्जा प्राप्त हो जायेगा। यदि हम विश्व में सर्वोपरि स्थान प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें निम्नलिखित विसंगतियां समाप्त करनी होंगी।
हमारे देश में हर धर्म और जाति का व्यक्ति स्वयं को बहुत बड़ा देशभक्त बताता है लेकिन देश के संविधान का कितना सम्मान करता है जरा देखंे एक हिन्दू जो मुसलमान के बनाये मंदिर में पूजा करता है, मुसलमान की बनायी कावड़ से गंगाजल ले जाकर अपने भगवान को अर्पित करता है, मुसलमान राजमिस्त्री के बनाये मंदिर में पूजा करता है, मुसलमान के बनाये मकान में रहता है, उसी के बनाये पटाखों को दीपावली एवं शादी विवाह में बजाकर खुशियां मनाता है, ईद की बधाई देता है, रोजा इफ्तार पार्टी देता है, दीपावली पर उपहार देता है जब दोनों मिलते हैं तो भाई-भाई जैसा बर्ताव करते हैं लेकिन जब हिन्दू अपने हिन्दू भाईयों में बैठता है तो मुसलमानों को मलेच्छा बताता है और कहता है कि कटुओं की आबादी बढ़ रही इन्हें काट-काटकर फेंक दो। वहीं दूसरी तरफ एक मुसलमान बैण्ड मास्टर हिन्दू धर्म के गीतों की ध्वनि पर थिरकता है, हिन्दुओं के लिए कावड़ तैयार करता है, हिन्दू बाहुल्य क्षेत्रों में सब्जी, फल बेचता है, रिक्शा, टैम्पो एवं तांगा चलाकर उनकी सेवा करता है, उनकी धार्मिक मूर्तियां और मंदिर बनाता है होली, दीपावली की बधाई देता है शादी विवाह समारोहों में सगन भी देता है लेकिन जब वह अपने मुस्लिम भाईयों के साथ बैठता है तो हिन्दुओं को काफिर कहकर संबोधित करता है और कहता है कि काफिरों का कत्ल करने से शबाब मिलता है। जब दोनों आमने-सामने मिलते हैं तो फिर भाई-भाई हो जाते हैं।
मैं दूसरे धर्म ग्रंथ पर तो उंगली नहीं उठा सकता लेकिन हमारे एक धर्मग्रंथ में लिखा है कि ‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी ये सब ताड़न के अधिकारी’ इसी गं्रथ में लिखा है ‘पूजहिं विप्र सकल गुण हीना, शूद्र न पूजहिं वेद प्रवीना।’ जिसके धर्मग्रंथ में ही ऐसी विसंगति हो उस धर्म की जातियों में विसंगति होना स्वभाविक है। इस धर्म की अनेकों जातियां स्वयं को दूसरे से उत्तम बनाने के लिए जिन गलत और आपत्तिजनक मुहावरे का उपयोग करते हैं वे हैं- ‘अहिर मिताई न करे, अहिरा मीत न होय’, ‘अहीर गड़रिया गूजर ये तीनो चाहे ऊजर’, ‘बनिया बनी का नहीं तो....’, ‘तगा किसी का सगा नहीं, जब देवे तो दगा दगा’, ‘जाट मरा तब जानियो जब तेरहीं हो जाये’, ‘कहने से कुम्हार गधे पर नहीं चढ़ता’, ‘काला बामन-गोरा चमार...’, ‘सूरज हुआ अस्त, पहाड़ी हुआ मस्त’, ‘आदमियों में नौआ, ‘पक्षियों में कौवा बहुत चालक होते हैं’, ‘सैनी सट्टे-चमार चट्टे...’, ’कायस्थ का बच्चा कभी न बोले सच्चा, जब बोले सच्चा तो.....’, ‘ठाकुर चाहें कितना भी सीधा हो, हासिए की फाल के बराबर टेढ़ा जरुर होगा’, ‘धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का, सरदार की बुद्धि 12 बजे...’ तथा ‘झीबर झोके’ जैसे इतने गलत-गलत संबोधन इस समाज में प्रचलित हैं जो सामाजिक एकता में बाधक है इन्हंे यदि प्रत्येक धर्म, समाज और जाति के व्यक्ति सुधार लें तो आपसी प्रेम और भाईचारा इतना प्रगाढ़ हो जाये कि थाना, कचहरी और डॉक्टर सभी से मुक्ति  मिल जाये।

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