हरिद्वार। भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक घटक है जो स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय से ही अपनी अलग विचारधारा के रुप में जाना जाता है। संघ के तत्कालीन कई नेताओं पर अंग्रेजों की जी-हजूरी तथा स्वतंत्रता संग्रमा सेनानियों की जासूसी करने के भी आरोप लग चुके हैं। भाजपा के पास कांग्रेस तथा अन्य दलों की बुराई करने के अलावा कोई विजन नहीं है। कांग्रेस की बुराई के आधार पर तथा देश की जनता से झूठे वादे कर भाजपा केन्द्र की सत्ता में काबिज हुई और विभिन्न राज्यों में अंग्रेजों वाली नीति फूट डालो और राज करो की योजना के तहत ही अन्य दलों से गठबंधन कर अथवा दूसरे दल को दो फाड़ कर सत्ता कब्जायी। केन्द्र हो या राज्य भाजपा के शासनकाल में जनता का हर वर्ग परेशान है किसी वर्ग, जाति या धर्म के लोगों के चेहरे पर मुस्कान नहीं है और तो और भाजपा के ही पुराने और निष्ठावान नेताओं को किनारे लगा दिया गया है तथा देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराकर 21वीं सदी को साधन सम्पन्न समाज प्रदान करने वाली कांग्रेस पार्टी तथा उसके राजनेताओं को ऐसे-ऐसे संबोधन प्रदान कर दिए गए हैं कि भारत के मुख्य राजनैतिक परिवार के उत्तराधिकारी को कुछ समाजद्रोही तथा आजादी के दुश्मन लोग पप्पू के नाम से पुकारने लगे हैं। ऐसे लोगों के हाथ में पार्षद से लेकर प्रधानमंत्री तक की जिम्मेदारी देना देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा। देश की जनता आज दोराहे पर खड़ी है एक तरफ तो वे लोग हैं जिन्होंने देश को आजाद कराने में बलिदान दिए और आजाद होने पर देश तथा समाजद्रोहियों के हाथों अपनी हत्या का दंश झेला, पंजाब से आतंकवाद का सफाया करने के बदले में जान दी तो एक ने देश को सूचना क्रांति से जोड़कर 21वीं सदी का भारत निर्माण करने का सपना संयोजा तो अपनी कुर्बानी दी इतने बड़े राष्ट्रभक्त परिवार के उत्तराधिकारी को आज पप्पू के खिताब से नवाजा जा रहा है क्या यही भारत की सनातन संस्कृति है? जनता के लिए दूसरी तरफ वो लोग हैं जिन्होंने देश को आजाद कराने वाले महात्मा गांधी की हत्या करायी, नेताजी सुभाषचंद बोस द्वारा 1938 में की गई नेशनल प्लानिंग कमेटी की स्थापना को यादगार के रुप में बनाये रखने के लिए जिस कांग्रेस ने योजना आयोग का गठन किया था भाजपा ने उसका नाम बदलकर नेताजी सुभाषचंद बोस का भी अपमान किया। वर्तमान भाजपा उस विचारधारा का नाम है जो न तो अपने पुराने राजनेताओं को सम्मान दे रही न ही देश की जनता को। अब तक इस धर्म निरपेक्ष देश में सभी धर्मों को समान रुप से सम्मान मिलता आया है लेकिन वर्तमान परिपेक्ष में धर्म को सम्मान देने के स्थान पर धर्म के नाम पर राजनीति हो रही है और धर्म तथा जाति के आधार पर समाज को बांट कर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं। नोटबंदी तथा जीएसटी जैसे निर्णयों ने देश की जनता के हर वर्ग की कमर तोड़ दी है। नोटबंदी भारत ही नहीं विश्व का सबसे बड़ा घोटाला है जिसका खुलासा कभी वर्तमान सत्ता के जाने के बाद ही होगा और इस नोटबंदी का प्रभाव भारत को तब तक कमजोर करता रहेगा जब तक आने वाली सरकार दोबारा नोटबंदी नहीं करेगी। जनता को आभास होने लगा है कि नए नोटों की छपाई मानकों के विपरीत हुई है। एक ही नम्बर के तीन-तीन नोट मिलना देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने के संकेत के रुप में देखे जा रहे हैं।
समाचार-पत्र समाज के मार्ग दर्शक होते हैं और समाज के आईना (दर्पण) भी होते हैं, समाचार-पत्र का प्रकाशन एक ऐसा पवित्र मिशन है जो राष्ट्र एवं समाज को समर्पित होता है। समाचार-पत्र ही समाज और सरकार के बीच एक सेतु का काम करते हैं, जनता की आवाज सरकार तक तथा सरकार की योजनायें जनता तक पहुंचाकर विकास का सोपान बनते हैं। आजादी के पूर्व तथा आजादी के बाद से लगभग पांच दशक तक समाचार-पत्रों ने सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका का निर्वाह किया। 1975 में लगे आपातकाल से भी समाचार-पत्र विचलित नहीं हुए और उन्होंने अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह किया ऐसा तब तक ही हुआ जब तक पत्रकार ही समाचार पत्र के प्रकाशक, स्वामी एवं संपादक होते थे ऐसा अब नहीं है। समाचार पत्रों की निष्पक्षता और निर्भीकता कुछ पंूजीपतियों को रास नहीं आयी और उन्होंने मीडिया जगत पर अपना प्रभुत्व जमाना प्रारम्भ कर दिया। पहले तो समाचार-पत्रों की जनता से पकड़ ढीली करने के लिए इलैक्ट्रोनिक मीडिया को जन्म दिया और बाद में प्रिंट मीडिया का स्वरुप बदल कर उसके मिशन को समाप्त कर व्यावसायिकता में बदल दिया। चंद पूंजीपतियों ने सरकार से सांठगांठ कर मीडिया...
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