हरिद्वार। दिल्ली में सीबीआई अफसरों की अदला-बदली को लेकर चल रही उठापटक ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा चार वर्षों में की गई तानाशाही की सारी पोल पट्टी खोल दी है और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद प्रधानमंत्री पर जितनी उंगलियां आज उठ रही हैं उतनी आजादी के सत्तर साल में अब तक किसी प्रधानमंत्री पर नहीं उठीं। न्यायपालिका का यही रुख रहा तो नरेन्द्र मोदी अब तक सत्ता संचालन के सर्वाधिक तानाशाह प्रधानमंत्री के रुप में जाने जायेंगे। सीबीआई और ईवीएम के माध्यम से अपने पक्ष में मतदान कराने, योजना आयोग का नाम और स्वरुप बदलने के साथ ही राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों का भी दुरुपयोग करने के आरोप लगते रहे हैं।
सीबीआई हमारे देश की ऐसी सर्वोच्च संस्था है जिसके निदेशक की नियुक्ति भी प्रधानमंत्री कार्यालय, सर्वोच्च न्यायालय तथा नेता प्रतिपक्ष की सहमति से होती है लेकिन हमारे प्रधानमंत्री ने विपक्ष एवं न्यायपालिका सभी के अधिकारों को ताक पर रखकर वहां भी अपने गुजरात वाले जाने-माने माडल का प्रयोग कर अपनी भद्द अपने आप पीट ली है। वास्तविकता यह कि नरेन्द्र मोदी देश के सबसे सम्पन्न और समस्या विहीन प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे तथा कभी भी संसद के किसी सदन के सदस्य न रहकर सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे।
उन्होंने चार साल तक जमकर गुजरात स्टाइल में देश को चलाया और विदेशों की सैर की उन्हें केन्द्रीय सत्ता के संचालन का अनुभव नहीं था जो नोटबंदी और जीएसटी लागू करने से ही स्पष्ट हो गया था। दिल्ली का नियम है कि चार साल तक ब्यूरोक्रेसी प्रधानमंत्री की कठपुतली बनकर कार्य करती है लेकिन सत्ता का पांचवां साल लगते ही ब्यूरोक्रेसी को सरकार बदलने का भय सताने लगता है और वर्तमान सरकार को पांचवे साल में कार्यपालिका अपनी अंग्रेजियत का असर दिखाने लगती है। इस पांचवें वर्ष में अधिकारी अपनी भावी नौकरी बचाने के लिए अपने अधिकारों को कर्तव्य परायणता से जोड़कर चलते हैं जैसा कि लोकसभा के उपचुनाव तथा अन्य मामलों में देखा भी जा चुका है।
भारत में पहली बार संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को एक दल विशेष और व्यक्ति विशेष की मंशा के अनुरुप कार्य करने वाले के रुप में देखा गया जो शायद अब ऐसा नहीं हो पायेगा क्योंकि आगामी वर्ष लोकसभा के चुनाव होने हैं और उन चुनावों में सत्ता बदल भी सकती है इसीलिए सभी संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही भी देखी जायेगी। सम्पूर्ण विपक्ष 2019 का लोकसभा चुनाव मत-पत्र के माध्यम से कराना चाहता है इससे पूर्व भी अन्य चुनावों में यह मांग उठी लेकिन चुनाव आयोग ने किसी भी विपक्षी नेता की एक न सुनी। इसी वर्ष के अन्त तक जितने संवैधानिक पदों का अब तक दुरुपयोग हुआ है सभी का खुलासा होने की उम्मीद है क्योंकि देश की जनता के विचार और भावनायें दोनों ही अब बदले-बदले से लगने लगे हैं। विपक्ष की बुराई और तरह-तरह की बातें बनाकर अधिक समय तक देश को नहीं चलाया जा सकता है, जब एक झूठ से पर्दा उठता है तो सभी झूठ नंगे हो जाते हैं और सीबीआई के बाद अन्य संवैधानिक संस्थाओं की आवाज भी न्यायपालिका तक अवश्य पहुंचेगी।
सीबीआई हमारे देश की ऐसी सर्वोच्च संस्था है जिसके निदेशक की नियुक्ति भी प्रधानमंत्री कार्यालय, सर्वोच्च न्यायालय तथा नेता प्रतिपक्ष की सहमति से होती है लेकिन हमारे प्रधानमंत्री ने विपक्ष एवं न्यायपालिका सभी के अधिकारों को ताक पर रखकर वहां भी अपने गुजरात वाले जाने-माने माडल का प्रयोग कर अपनी भद्द अपने आप पीट ली है। वास्तविकता यह कि नरेन्द्र मोदी देश के सबसे सम्पन्न और समस्या विहीन प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे तथा कभी भी संसद के किसी सदन के सदस्य न रहकर सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे।
उन्होंने चार साल तक जमकर गुजरात स्टाइल में देश को चलाया और विदेशों की सैर की उन्हें केन्द्रीय सत्ता के संचालन का अनुभव नहीं था जो नोटबंदी और जीएसटी लागू करने से ही स्पष्ट हो गया था। दिल्ली का नियम है कि चार साल तक ब्यूरोक्रेसी प्रधानमंत्री की कठपुतली बनकर कार्य करती है लेकिन सत्ता का पांचवां साल लगते ही ब्यूरोक्रेसी को सरकार बदलने का भय सताने लगता है और वर्तमान सरकार को पांचवे साल में कार्यपालिका अपनी अंग्रेजियत का असर दिखाने लगती है। इस पांचवें वर्ष में अधिकारी अपनी भावी नौकरी बचाने के लिए अपने अधिकारों को कर्तव्य परायणता से जोड़कर चलते हैं जैसा कि लोकसभा के उपचुनाव तथा अन्य मामलों में देखा भी जा चुका है।
भारत में पहली बार संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को एक दल विशेष और व्यक्ति विशेष की मंशा के अनुरुप कार्य करने वाले के रुप में देखा गया जो शायद अब ऐसा नहीं हो पायेगा क्योंकि आगामी वर्ष लोकसभा के चुनाव होने हैं और उन चुनावों में सत्ता बदल भी सकती है इसीलिए सभी संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही भी देखी जायेगी। सम्पूर्ण विपक्ष 2019 का लोकसभा चुनाव मत-पत्र के माध्यम से कराना चाहता है इससे पूर्व भी अन्य चुनावों में यह मांग उठी लेकिन चुनाव आयोग ने किसी भी विपक्षी नेता की एक न सुनी। इसी वर्ष के अन्त तक जितने संवैधानिक पदों का अब तक दुरुपयोग हुआ है सभी का खुलासा होने की उम्मीद है क्योंकि देश की जनता के विचार और भावनायें दोनों ही अब बदले-बदले से लगने लगे हैं। विपक्ष की बुराई और तरह-तरह की बातें बनाकर अधिक समय तक देश को नहीं चलाया जा सकता है, जब एक झूठ से पर्दा उठता है तो सभी झूठ नंगे हो जाते हैं और सीबीआई के बाद अन्य संवैधानिक संस्थाओं की आवाज भी न्यायपालिका तक अवश्य पहुंचेगी।
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