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सरकारी उपेक्षा का शिकार है अन्नदाता

भारत कृषि प्रधान देश है जहां आज भी 60-70 प्रतिशत आबादी कृषि के माध्यम से स्वरोजगार अर्जित करती है तथा भारत दुनिया का पहला ऐसा देश है जो आजादी के बाद सबसे पहले खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना जबकि भारत के उद्योग, तकनीकि एवं शिक्षा सहित कई ऐसे आवश्यक अंग हैं जिनमें भारत अन्य देशों की तुलना में न केवल पीछे है बल्कि रक्षा उपकरण, कृषि विकास, तकनीकी एवं चिकित्सा के क्षेत्र में दूसरे देशों पर आधारित है। विडम्बना यह है कि वर्तमान सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था लेकिन चार साल बीतने के बाद भी अभी तक कृषकों की लागत के बराबर भी उपज का समर्थन मूल्य किसान को प्राप्त नहीं हो रहा है उसके विपरीत उद्योगपतियों के उत्पाद इन्हीं चार वर्षों में दो से तीन गुनी कीमत पर पहुंच गए हैं इससे स्पष्ट हो गया कि वर्तमान सरकार जो कहती है उसका उल्टा करती है और ऐसी सरकार से कृषकों को अपने विकास की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए।
भारत लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है जहां अनशन एवं आन्दोलनों का विशेष महत्व होता है। किसान आन्दोलन का इतिहास देश की आजादी से भी पुराना है लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषक नेता महेन्द्र सिंह टिकैत ने कृषकों में जागरुकता की जो पहल की उससे कृषक आन्दोलनों को बल तो मिला लेकिन देश एवं राज्यों की सरकारें आज भी किसानों को नकार कर उद्योगपतियों के इशारों पर चलती हैं। 
कृषि को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार जिस अनुदान की व्यवस्था करती है उसका लाभ भी कृषि यंत्र अथवा रासायनिक खाद बनाने वाले उद्योगपति ही लेते हैं और सरकार द्वारा प्रतिवर्ष घोषित होने वाला फसलों का समर्थन मूल्य पूरा कभी भी कृषक को नहीं मिलता यही कृषि एवं कृषक की दुर्दशा का मुख्य कारण है। कृषकों की समस्याओं के समाधान को दृष्टिगत रखते हुए सरकार ने प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक एन.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में भले ही 2004 में किसान आयोग का गठन कर दिया लेकिन आयोग ने जो सिफारिशें की उनको लागू नहीं किया गया। जय जवान जय किसान का नारा देने वाले हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री एवं आजादी के महानायक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयन्ती के अवसर पर इस वर्ष भी किसानों ने 2 अक्टूबर को दिल्ली जाकर अपनी जायज मांगे सरकार के समक्ष रखने का प्रयास किया तो किसनों के साथ सरकार किस तरह पेश हुई इसकी जितनी भर्त्सना की जाये कम है। किसान ही भारत के गौरव हैं और सेनाओं में भी किसानों के बच्चे राष्ट्र रक्षा कर रहे हैं फिर भारत में किसानों की दशा दयनीय होना यहां की सरकार की नीति एवं नियति का परिणाम है, इसके लिए किसानों को स्वयं अपने उद्धार और उत्थान का मार्ग तलाशना होगा।

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