हरिद्वार। उत्तराखण्ड राज्य में आजकल स्थानीय निकाय चुनाव चल रहे हैं। राजनीति कितना बड़ा कारोबार बन गया है इसका अंदाजा राजनेताओं की चुनाव जीतने के बाद बढ़ी सम्पत्तियों के आकलन से लगाया जा सकता है। इस छोटे से चुनाव में टिकट की कितनी मारामारी चली, साम, दाम, दण्ड, भेद सबकुछ प्रयोग में लाया गया आखिर क्यों, क्या यह सब जनता की सेवा करने की भावना का जुनून है या नेता बनकर धनपति बनने के कारोबार की बुनियाद मजबूत करने का।
हमारे देश में कौन गरीब है और कौन-कौन रईस है, गरीब-गरीब कैसे बना और रईस-रईस कैसे बने तथा सूफी व्यक्ति शराबी कब बनता है। एक सीधा-सादा युवा शराब की लत कब पकड़ता है इन सब के पीछे चुनाव ही हैं देश में जब भी चुनाव आते हैं। 15-20 प्रतिशत नया शराबी पैदा हो जाता है। तीन-चार प्रदेशों में किए गए सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट हो गया है कि चुनाव में प्रत्याशी मुफ्त की शराब बांटते हैं और नवयुवक एक सप्ताह की इस चुनावी अवधि में शराब पीने के आदी हो जाते हैं फिर पांच वर्ष तक अपने पैसे से खरीद कर शराब पीते हैं जिससे सरकार को सर्वाधिक राजस्व की प्राप्ति होती है इस सारी प्रक्रिया को संत समाज और सरकारी अधिकारी सभी जानते हैं लेकिन किसी का मंुह नहीं खुलता और न ही कोई कार्यवाही करता यही कारण है कि चुनाव की जीत हार का फैसला शराब करती है। नेता शराब पिलाकर वोट खरीदते हैं और जनता शराब पीकर अपना वोट और जमीर दोनों बेच देती हैं यही कारण है कि आज न तो नेता ही जनता की आवाज सुनता न अधिकारी क्योंकि वे सब जनता की औकात जानते हैं। हर चुनाव में शराब की नदियां बहती हैं, दूध की क्यों नहीं बहती? क्योंकि दूध व्यक्ति को बुद्धि और विवेक प्रदान करता है जबकि शराब व्यक्ति की बुद्धि और विवेक दोनों को समाप्त कर देती है। शराब के सेवन से व्यक्ति की मानसिकता दूषित हो जाती है और वह अच्छे-बुरे का ज्ञान भूल जाता है तथा अंधभक्त बनकर ऐसे प्रत्याशी और पार्टी का चयन कर लेता है जो देश और समाज की दुश्मन बनकर उभर रही है। उत्तराखण्ड ही नहीं पूरे देश की जनता शराब पीकर वोट देने का नतीजा भुगत चुकी है और उत्तराखण्ड नया राज्य बनने के 18 वर्ष बाद भी बद से बदतर स्थिति में पहुंचा उसके मूल में भी कहीं न कहीं शराब ही है। इस प्रदेश की गिनती उन प्रदेशों में होती है जहां सरकारी कर्मचारी अपनी ड्यूटी के समय ही शराब का सेवन कर लेते हैं और उनके उच्चाधिकारी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते। शराब उत्तराखण्ड के लिए अभिशाप बन रही है, हरिद्वार और ऋषिकेश सहित चारधाम यात्रा मार्ग प्रतिबंधित होते हुए भी यहां शराब बिक रही है। हरिद्वार में नगर पालिका वायलाज का खुला उल्लंघन हुआ है जो ठेके शहर से पांच मील दूर होते थे वे शराब के ठेके अब शहर की सीमा में आ गये हैं यह प्रशासन और सरकार के काले कारनामों की बानगी है। देवभूमि उत्तराखण्ड और हरिद्वार की जनता यदि तीर्थस्थलों के लिए कुछ अच्छा चाहती है तो शराब बांटने वाले प्रत्याशियों का विरोध करे और जिनका झूठ सामने आ चुका है या जनता जिनकी कार्यशैली देख चुकी है उनके कार्य और व्यवहार के आधार पर चयन करे, युवा वर्ग शराब के बदले अपने वोटों का सौदा न करे।
हमारे देश में कौन गरीब है और कौन-कौन रईस है, गरीब-गरीब कैसे बना और रईस-रईस कैसे बने तथा सूफी व्यक्ति शराबी कब बनता है। एक सीधा-सादा युवा शराब की लत कब पकड़ता है इन सब के पीछे चुनाव ही हैं देश में जब भी चुनाव आते हैं। 15-20 प्रतिशत नया शराबी पैदा हो जाता है। तीन-चार प्रदेशों में किए गए सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट हो गया है कि चुनाव में प्रत्याशी मुफ्त की शराब बांटते हैं और नवयुवक एक सप्ताह की इस चुनावी अवधि में शराब पीने के आदी हो जाते हैं फिर पांच वर्ष तक अपने पैसे से खरीद कर शराब पीते हैं जिससे सरकार को सर्वाधिक राजस्व की प्राप्ति होती है इस सारी प्रक्रिया को संत समाज और सरकारी अधिकारी सभी जानते हैं लेकिन किसी का मंुह नहीं खुलता और न ही कोई कार्यवाही करता यही कारण है कि चुनाव की जीत हार का फैसला शराब करती है। नेता शराब पिलाकर वोट खरीदते हैं और जनता शराब पीकर अपना वोट और जमीर दोनों बेच देती हैं यही कारण है कि आज न तो नेता ही जनता की आवाज सुनता न अधिकारी क्योंकि वे सब जनता की औकात जानते हैं। हर चुनाव में शराब की नदियां बहती हैं, दूध की क्यों नहीं बहती? क्योंकि दूध व्यक्ति को बुद्धि और विवेक प्रदान करता है जबकि शराब व्यक्ति की बुद्धि और विवेक दोनों को समाप्त कर देती है। शराब के सेवन से व्यक्ति की मानसिकता दूषित हो जाती है और वह अच्छे-बुरे का ज्ञान भूल जाता है तथा अंधभक्त बनकर ऐसे प्रत्याशी और पार्टी का चयन कर लेता है जो देश और समाज की दुश्मन बनकर उभर रही है। उत्तराखण्ड ही नहीं पूरे देश की जनता शराब पीकर वोट देने का नतीजा भुगत चुकी है और उत्तराखण्ड नया राज्य बनने के 18 वर्ष बाद भी बद से बदतर स्थिति में पहुंचा उसके मूल में भी कहीं न कहीं शराब ही है। इस प्रदेश की गिनती उन प्रदेशों में होती है जहां सरकारी कर्मचारी अपनी ड्यूटी के समय ही शराब का सेवन कर लेते हैं और उनके उच्चाधिकारी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते। शराब उत्तराखण्ड के लिए अभिशाप बन रही है, हरिद्वार और ऋषिकेश सहित चारधाम यात्रा मार्ग प्रतिबंधित होते हुए भी यहां शराब बिक रही है। हरिद्वार में नगर पालिका वायलाज का खुला उल्लंघन हुआ है जो ठेके शहर से पांच मील दूर होते थे वे शराब के ठेके अब शहर की सीमा में आ गये हैं यह प्रशासन और सरकार के काले कारनामों की बानगी है। देवभूमि उत्तराखण्ड और हरिद्वार की जनता यदि तीर्थस्थलों के लिए कुछ अच्छा चाहती है तो शराब बांटने वाले प्रत्याशियों का विरोध करे और जिनका झूठ सामने आ चुका है या जनता जिनकी कार्यशैली देख चुकी है उनके कार्य और व्यवहार के आधार पर चयन करे, युवा वर्ग शराब के बदले अपने वोटों का सौदा न करे।
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