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मायावती को करना पड़ेगा संकट का सामना

इसी वर्ष के अंत में होने वाले तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव आगामी वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा के आम चुनावों के सेमीफाइनल के रुप में देखे जा रहे हैं। इन चुनावों में भी बसपा का गठबंधन संबंधी रुख स्पष्ट न होने के कारण विपक्षी एकता बनती नजर नहीं आ रही है परिणाम स्वरुप फिर से राज्य सरकारों के दोहराने के साथ ही केन्द्र में भी भाजपा का दावा मजबूत हो जायेगा। आसन्न विधानसभा चुनावों वाले तीनों राज्यों विशेषकर मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में दलितों की संख्या अन्य के मुकाबले निर्णायक समझी जा रही है और पिछले लोकसभा तथा विधानसभाओं के चुनावों के आंकड़े भी बताते हैं कि इन तीनों राज्यों में बसपा के चाहने वालों की संख्या तीन से पांच प्रतिशत रही है यही कारण है कि बसपा सुप्रीमो बहन मायावती अन्य दलों के साथ गठबंधन करने के स्थान पर अकेले दम पर चुनाव लड़ने का मन बना रही हैं यदि इन विधानसभा चुनावों में वे गठबंधन का अंग नहीं बनी तो आगे चलकर महागठबंधन भी उनको स्वयं में सम्मिलित करने पर असहमति व्यक्त कर सकता है। पिछले चुनावों में  बसपा का यह आंकड़ा तब का था जब वे यूपी की सत्ता में थीं और एक मुख्यमंत्री के रुप में दबंगई उनका रुतबा था।
फिलहाल वे कहीं भी सत्ता में नहीं हैं और पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी उत्तर प्रदेश में भी कोई सीट नहीं आयी तथा विधायक कम होने के कारण भविष्य में उनकी स्वयं की राज्यसभा सदस्यता पर भी खतरा आ सकता है ऐसी स्थिति में उनको अपना अहम त्याग कर गठबंधन में सम्मिलित हो जाना चाहिए। 
उधर भाजपा और संघ की नीति रही है कि जब वह किसी के विरोध में चुनावी मैदान में आते हैं तो पहले सामने वाले की शक्ति को कमजोर करते हैं और यदि कहीं गठबंधन होने की संभावना होती है तो उस गठबंधन को रोकने के लिए और यदि हो गया तो उसे तोड़ने के लिए ऐड़ी से लेकर चोटी तक का जोर लगा देते हैं। जहां एक तरफ विपक्षी एकता पर प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं वहीं भाजपा की भी छवि सत्ता में आने के बाद काफी धूमिल हुई है और प्रधानमंत्री के बड़बोलेपन से देश की जनता उनका उपहास उड़ाती है ऐसी स्थिति में भाजपा के पक्ष में ऐसा कहीं नहीं लग रहा कि वह दोबारा केन्द्र की सत्ता में वापसी कर सके, भाजपा यदि 2019 में सत्ता से बेदखल होती है तो उसका सबसे बड़ा कारण मोदीजी का झूठ होगा। अभी हाल में उन्हांेने ईवीएम पर प्रश्न चिन्ह लगाने वालों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे जब 1984 में चुनाव हारे थे तब उन्हांेने ईवीएम को दोषी नहीं ठहराया था जबकि पूरा देश जानता है कि 1984 के चुनाव में ईवीएम भारत में पैदा ही नहीं हुई थी। ईवीएम के अलावा कहीं से भी ऐसा संकेत नहीं है कि भाजपा की दोबारा सत्ता में वापसी होगी।

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