उत्तराखण्ड सरकार काफी समय से न्यायालय का सहारा लेकर स्थानीय निकाय चुनाव टालती रही अंततोगत्वा चुनावी बिगुल बज ही गया। सरकार की मंशा का खुलासा पहले ही दिन हो गया जब चुनाव की कोई तैयारी न होने का प्रमाण इस बात से लगा कि नामांकन पत्र लेने वाले जब पहुंचे तो कहीं भी तैयारी पूर्ण नहीं मिली। फिलहाल सत्तारुढ़ दल ईवीएम पर भरोसा किए बैठा था लेकिन अब चुनाव मत-पत्र के माध्यम से ही होंगे। ईवीएम का इतिहास रहा है कि वह भारत ही नहीं विश्व के अन्य देशों में भी अपनी अविश्वसनीयता दर्शा चुकी है इसीलिए कई देशों ने ईवीएम के स्थान पर मतपत्र के माध्यम से चुनाव कराने प्रारम्भ कर दिए हैं लेकिन हमारे देश में यह अब भी बहुत बड़ा अपवाद बना हुआ है। तानाशाही कोई भी चला ले लेकिन ईवीएम के सहारे कराये गए मतदान को सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसके परिणाम में बदलाव संभव है जिसका प्रयोग अब तक केन्द्र की सत्ता में रही दोनों पार्टियां कर भी चुकी हैं। दोनों पार्टियों द्वारा एक-दूसरे पर लगाये जा रहे आरोप-प्रत्यारोपों से अब यह सिद्ध हो गया है कि ईवीएम के सहारे बेईमानी करना आसान है फिर भी ईवीएम में कमी पाई जाने के बाद अब किसी जिम्मेदार सरकारी अधिकारी को न तो नौकरी से हटाया गया न ही जेल भेजा गया इसका सीधा अर्थ है कि ईवीएम की सेंटिंग राजनेता उन भ्रष्ट अधिकारियों से मिलकर करते हैं जो राजकीय सेवा में केवल और केवल देश की जनता की मेहनत से कमाये गए धन को भ्रष्टाचार के माध्यम से लूट रहे हैं।
फिलहाल उत्तराखण्ड राज्य में स्थानीय निकाय चुनाव की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी है और टिकट के दावेदारों के दिन का चैन और रातों की नींद खराब हो रही है, ये नेता टिकट पाने और चुनाव जीतने के लिए कितने बेताब हैं क्या इनके अंदर की राष्ट्रभक्ति और समाजहित की भावना जाग्रत हो रही है या पुराने नेताओं की तरह पांच साल में ही मालामाल होने के लिए बेताब हैं। जनता पुराने प्रतिनिधियों की कार्यशैली देखकर निर्णय ले और युवा पीढ़ी बोतलों में घुसकर मतदान का मन न बनाये।
देश, प्रदेश, जनपदों, शहरों और वार्डों की जनता की यदि याददाश्त उसके मस्तिष्क रुपी कम्प्यूटर की मेमौरी से यदि डिलीट न हुई हो तो वह अतीत के आधार पर आकलन करने के बाद ही मतदान का मन बनाये। जिस व्यक्ति विशेष के नाम पर जनता अपने लिए अच्छे दिनों की आस लगाये बैठी थी उस व्यक्ति ने कुर्सी पर बैठने के बाद क्या किया और आज भी क्या कर रहा है तो भविष्य में और क्या करेगा इस विश्लेषण को यदि नहीं किया गया तो हमारी भावी पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी, वैसे भी राजनेताओं के इसी चरित्र का प्रभाव है कि आजकल के बच्चे अपने मां-बाप को किसी प्रकार की तरजीह न देकर वे जो कर रहे हैं उस पर उन्हीं को कोस रहे हैं। ऐसा नहीं है कि मां-बाप क्या कर रहे हैं इसका इल्म बच्चों को नहीं है बल्कि आजकल के बच्चे अपने मां-बाप से ज्यादा दिमाग रखते हैं वे भली प्रकार जानते और देखते हैं कि चुनाव के समय प्रत्याशी जब उनके घर पर आते हैं तो क्या-क्या देकर जाते हैं। बच्चे भी समझते हैं कि उसके बाप ने वोट के बदले नोट लिए और शराब पीकर अपने वोट की कीमत पहले ही वसूल कर ली तो भला नेता क्यों काम करेगा। बच्चों से ही मां-बाप को झूठ और फरेब की शिक्षा मिलती है कि उनके माता-पिता ने चुनाव के दस दिन मुख्य रुप से एक सप्ताह तक सभी प्रत्याशियों को वोट देने का झूठा आश्वासन दिया और सभी से उपकृत हुए। वोट किसको दिया होगा यह तो नहीं पता लेकिन उनके माता-पिता ने सभी प्रत्याशियों का एक सप्ताह तक खूब बेवकूफ बनाया यह बच्चों ने देखा है।
किसी भी राज्य में वहां तैयार किए गए वातावरण के लिए और परिस्थितियों के लिए सत्तारुढ़ दल को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। राज्य की जनता भी इस चुनाव में सत्तारुढ़ दल से जवाब मांगेगी कि उसने अपने कार्यकाल में शहर के विकास के लिए क्या किया पूरे शहर की सड़के खुदी पड़ी हैं। हाईवे अधूरे हैं यातायात बाधित है शहर से लेकर गांव तब सड़कों पर धूल और गड्ढे हैं। मास्टर प्लान और अतिक्रमण के नाम पर शहर के व्यापारियों की दुकानें तोड़कर उनको बेरोजगार बनाया गया। पहले नोटबंदी और जीएसटी से उनकी कमर तोड़ी गयी, अब दुकाने ही तोड़ दी गई ले लो वोट! शहर में पेयजल का मूल्य बढ़ा सीवर कर कई गुना बढ़ा दिया गृहकर में बेहताशा वृद्धि की फिर भी वोट मांगने के लिए मंुह धोए बैठे हैं। क्योंकि इन्हांेने हया शर्म बेच दी है शुद्ध रुप से कलियुगी नेता बन गए हैं इसीलिए मतदाताओं को भी कलियुगी मतदाता बना रहे हैं शायद यही दिन देखने के लिए हमारे पूर्वजों ने अपनी शहादत देकर देश को आजाद कराया था।
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