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श्रीराम हैं धर्मए चरित्र एवं मर्यादित आचरण की प्रतिमूर्ति : स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती

हरिद्वार। श्रीगीता विज्ञान आश्रम के परमाध्यक्ष महामण्डलेश्वर स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा है कि विजयदशमी धर्म के संरक्षण का पर्व है जो अन्यायए अत्याचार एवं अहंकार पर न्यायए सदाचार एवं सामाजिक समरसता की विजय के रुप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। भगवान श्रीराम धर्मए चरित्र एवं मर्यादित आचरण की प्रतिमूर्ति हैं तथा नवरात्र व्रत साधना के माध्यम से समाज जब अध्यात्म एवं अर्न्तमन की शक्ति का सृजन करता है तो उसमें इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने की इच्छाशक्ति दृढ़ हो जाती है।
भगवान राम की रावण पर विजय के उपलक्ष में मनाया जाने वाला विजयदशमी पर्व व्यक्ति को धर्म के सापेक्ष व्यवहार कर कर्म में पवित्रता लाने का संदेश देता है। जिस प्रकार मां आदिशक्ति देवी ने देवताओं के आवाहन पर राक्षसों का वध किया उसी प्रकार त्रेता युग के अवतारी भगवान राम ने ऋषि विश्वामित्र के साथ जाकर राक्षसों से ऋषियों के यज्ञ की रक्षा की। विजयदशमी पर्व की अलग.अलग क्षेत्रों में मनाये जाने की प्रक्रिया की जानकारी देते हुए बताया कि इस दिन क्षत्रिय तथा संतों के अखाड़ों मंे जहां शस्त्र पूजा होती है वहीं व्यापारी वर्ग अपने बही खातों की पूजा कर व्यापार में समृद्धि की कामना करते हैं। विजयदशमी पर सम्पूर्ण भारतवर्ष में होने वाले रावण.कुम्भकरण के पुतलों के दहन का यथार्थ समझाते हुए उन्हांेने कहा कि रावण चारों वेदों का ज्ञाताए महान बलशाली एवं प्रतापी राजा था लेकिन बल एवं बुद्धि का प्रतिकूल प्रभाव होने के कारण उसे अहंकार होते हुए भी उसने मातृशक्ति के सम्मान के विपरीत कभी आचरण नहीं किया और भगवान राम के हाथों अपने मोक्ष की कामना के लिए ही सीता का हरण किया था।
नवरात्र साधना की पूर्णहुति स्वरुप होने वाले कन्या पूजन का यथार्थ समझाते हुए उन्हांेने कहा कि नौ का अंक ही पूर्णांक होता है इसीलिए मां आदिशक्ति देवी पराम्बा की नौ दिन की व्रत साधना के पश्चात भगवती देवी के नौ स्वरुपों की प्रतीक नौ कन्याओं का पूजन किया जाता है। सनातन धर्म में मोक्ष के विधान की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए उन्हांेने बताया कि चारों वेदों का ज्ञाता तथा सनातन धर्म का अनुयायी था जिसने भगवान शिव के धनुष का सम्मान करते हुए सीता स्वयंवर से स्वयं को अलग कर लिया तथा किसी स्त्री पर अत्याचार नहीं किया सीता को उसने अपने मोक्ष की कामना से अपहृत किया लेकिन अशोक वाटिका में कभी अकेले सीता से मिलने नहीं गया उसकी इसी महानता के कारण प्रतिवर्ष उसके पुतला दहन का दर्शन करने भारत के करोड़ों की संख्या में नर.नारी विभिन्न रामलीला मैदानों में जाते हैं। 

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