हरिद्वार। अध्यात्म एवं विज्ञान की समरुपता के प्रस्तोता तथा गीता एवं गायत्री के उपासक म.मं. स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा है कि नवरात्र साधना समता एवं शक्ति के संवर्द्धन का पर्व है जो ऋतु परिवर्तन से होने वाले दुष्प्रभावों से बचाकर व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति एवं उत्तम स्वास्थ्य का समावेश करता है वे आज दक्षनगरी के विष्णु गार्डन स्थित श्रीगीता विज्ञान आश्रम में सर्वपितृ विसर्जनी अमावस्या पर पधारे भक्तों को नवरात्र साधना का महत्व बतला रहे थे।
सूर्य को सृष्टि का प्रकट देव बताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान सूर्य ही ब्राह्मण्ड के देवता हैं जिनकी शक्ति से सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन होता है। शारदीय नवरात्र को सम मौसम तथा सूर्य की समता का पर्व बताते हुए कहा कि इस समय सूर्य पृथ्वी की ऐसी परिधि में होता है जब न तो गर्मी और न ही सर्दी होती है तथा जब वातावरण में समता आती है तो धराधाम पर विशेष दैवीय शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। नौ दिन की व्रत साधना को मां पराम्बा भगवती के नौ स्वरुपों से जोड़ते हुए उन्होंने बताया कि शक्ति को स्त्री तथा शक्तिमान को पुरुष के रुप में जाना जाता है। सूर्य विश्व की आत्मा है और समता सृष्टि के संरक्षण का आधार तथा समता रुपी ब्रह्म जब सात्विक आहार एवं सम व्यवहार में समाहित होता है तो साधक में दैवीय शक्तियों का समावेश हो जाता है। शुद्ध एवं सात्विक आहार में चलने वाली नौ दिन की साधना को अर्न्तमन की शक्ति सृजन का समय बताते हुए कहा कि व्यक्ति का भोजन जब सात्विक एवं संयमित होता है तो उसका तन और मन दोनों स्वस्थ हो जाते हैं। नवरात्र साधना में नौ दिन तक चलने वाले सद्भाव एवं कल्याण की भावना को वास्तविक पूजा बताते हुए कहा कि कन्या पूजन शक्ति उपासना की पूर्णाहूति स्वरुप होता है जो शक्ति के प्रति श्रद्धा एवं मातृ शक्ति के सम्मान की प्रतीक होती है तथा साधक रुपी शक्तिमान जब शक्ति स्वरुपा कन्या की पूजा करता है तभी दैवीय शक्तियां सृष्टि का कल्याण करती हैं।
सूर्य को सृष्टि का प्रकट देव बताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान सूर्य ही ब्राह्मण्ड के देवता हैं जिनकी शक्ति से सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन होता है। शारदीय नवरात्र को सम मौसम तथा सूर्य की समता का पर्व बताते हुए कहा कि इस समय सूर्य पृथ्वी की ऐसी परिधि में होता है जब न तो गर्मी और न ही सर्दी होती है तथा जब वातावरण में समता आती है तो धराधाम पर विशेष दैवीय शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। नौ दिन की व्रत साधना को मां पराम्बा भगवती के नौ स्वरुपों से जोड़ते हुए उन्होंने बताया कि शक्ति को स्त्री तथा शक्तिमान को पुरुष के रुप में जाना जाता है। सूर्य विश्व की आत्मा है और समता सृष्टि के संरक्षण का आधार तथा समता रुपी ब्रह्म जब सात्विक आहार एवं सम व्यवहार में समाहित होता है तो साधक में दैवीय शक्तियों का समावेश हो जाता है। शुद्ध एवं सात्विक आहार में चलने वाली नौ दिन की साधना को अर्न्तमन की शक्ति सृजन का समय बताते हुए कहा कि व्यक्ति का भोजन जब सात्विक एवं संयमित होता है तो उसका तन और मन दोनों स्वस्थ हो जाते हैं। नवरात्र साधना में नौ दिन तक चलने वाले सद्भाव एवं कल्याण की भावना को वास्तविक पूजा बताते हुए कहा कि कन्या पूजन शक्ति उपासना की पूर्णाहूति स्वरुप होता है जो शक्ति के प्रति श्रद्धा एवं मातृ शक्ति के सम्मान की प्रतीक होती है तथा साधक रुपी शक्तिमान जब शक्ति स्वरुपा कन्या की पूजा करता है तभी दैवीय शक्तियां सृष्टि का कल्याण करती हैं।
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