किसी भी सरकार में हुए भ्रष्टाचार के लिए राजनेता और ब्यूरोक्रेसी बराबर की दोषी होती है। राजनेता का कार्यकाल एक निर्धारित अवधि के लिए होता है जबकि ब्यूरोक्रेट्स 25-35 वर्ष तक के लिए जनता के करों से प्राप्त कमाई पर ऐश करते हैं। सरकार बदलने पर एक राजनेता तो दूसरे दल के राजनेता पर उंगली उठा भी देता है लेकिन कोई भी अधिकारी किसी अन्य अधिकारी पर दोषारोपण न कर यदि उसकी जांच उसके पास आती है तो पूरा सहयोग करता है और यदि उसे विशेष कृपा का पात्र बना दिया जाये तो अपनी नौकरी को भी दांव पर लगाकर सुविधा शुल्क को किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहता। इस परम्परा में तभी से वृद्धि हुई है जबसे सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारियों का वेतन उनकी आवश्यकता से कई गुना अधिक बढ़ गया, वर्तमान स्थिति यह है कि कोई भी सरकारी अधिकारी कर्मचारी अथवा राजनेता अपनी आय का पूरा धन व्यय नहीं कर पाता इसी से सामाजिक विषमता बढ़ रही है और महंगाई तथा बेरोजगारी इसी सामाजिक विषमता का परिणाम है। विडम्बना है कि सरकारी कोष का निर्माण आम जनता द्वारा दिये जाने वाले करों से होता है और उस पर डकैती डालने का काम सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी करते हैं। 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं तो राजनैतिक स्तर पर नेताओं की आरोप-प्रत्यारोप वाली रिहर्सल प्रारम्भ हो गयी है यह जुबानी जंग केवल बयानबाजी तक ही सीमित रहती है। राजनेता जो जितनी ज्यादा देशभक्ति की बात करता है वह उतना ही देश के प्रति गद्दार सिद्ध होता है लेकिन कुछ राजनेता तो इतने बड़े बदजुबान होते हैं कि उनके पास बातें बनाने के अलावा राष्ट्र या समाजहित की कोई योजना होती ही नहीं है वे तो बातों में घोटाला कर देते हैं और केन्द्रीय मंत्री तथा महिला सांसद को घोटाले के आरोप लगाकर जेल भी भिजवा देते हैं।भ्रष्टाचार मंे निपुण ये राजनेता दूसरे दलों के राजनेताओं पर ही आरोप-प्रत्यारोप लगाकर समाज का वातावरण दूषित करते हैं जबकि सभी घोटालों में ब्यूरोक्रेसी का अहम रोल होता है क्योंकि सरकारी खजाने से धन आहरित करने का अधिकार सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारियों को ही होता है। हमारे देश की आजादी जितनी पुरानी होती जाती है जनता उतने ही करों की मार झेल रही है और राजनेता तथा सरकारी अधिकारी अपने-अपने वेतन भत्ते बढ़ाकर मालामाल हो रहे हैं यह हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडम्बना है कि मालिक कंगाल और नौकर मालामाल, इस व्यवस्था को बदलना होगा अन्यथा लोकतंत्र को बदलकर देश को तानाशाही देश का नाम देना होगा। लोकतंत्र में सत्तारुढ़ दल का नेता विपक्ष और देश की जनता के समक्ष जवाबदेह होता है लेकिन यहां का सत्ताधारी दल कहता है कि सत्तर साल का एक-एक पाई का हिसाब लूंगा बताओ इसे हिसाब मांगने का अधिकार किसने दिया सत्तारुढ़ का दल नेता कहता है विपक्ष हमारे प्रश्नों का उत्तर नहीं दे रहा भला तुझे प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं बल्कि तेरी तो जनता के सामने जवाबदेही है।सत्तारुढ़ दल चार साल तक देश की जनता और अन्य दलों के नेताओं को तरह-तरह के भय दिखाकर खूब डराता रहा और जनता तथा नेता डरते रहे लेकिन पहली बार कांग्रेस के एक नेता ने अपनी बात बड़ी हिम्मत करते हुए सत्तारुढ़ दल की असलियत जनता के सामने खोलते हुए कहा कि चौकीदार भ्रष्ट भी है और चोर भी, ऐसा उन्होंने राफेल सौदे पर बोलते हुए कहा है जबकि इससे पूर्व मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला और यूपी का चिकित्सा विभाग का घोटाला कई जाने ले चुका है। यूपी उत्तराखण्ड ही नहीं बल्कि पूरे देश में दर्जनों बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं यदि सभी की सही जांच हो जाये तो कई सरकारी अधिकारी जेल चले जायेंगे और बेरोजगारों को रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे।
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