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मोदी के गुजरात माडल ने गिरायी संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा

हरिद्वार। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात जैसे छोटे, सम्पन्न तथा समस्याविहीन राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं और तीसरी बार मुख्यमंत्री चुने जाने के पहले ही उनको वहां के पंूजीपतियों ने गोद ले लिया था यही कारण था कि 2011-12 में गुजरात विधानसभा के लिए सम्पन्न हुआ चुनाव नरेन्द्र मोदी ने इन्हीं पूंजीपतियों के बल पर जीता था, उस चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने भाजपा के किसी बड़े नेता अथवा स्टार प्रचारक को अपने यहां नहीं बुलाया और अपने बलबूते अकेले ही चुनाव जीत कर यह सिद्ध कर दिया कि पार्टी में उनका कद इतना बड़ा हो गया है अब वे प्रधानमंत्री की कुर्सी भी संभाल सकते हैं। गुजरात के पूंजीपतियों की पहल पर ही मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया गया और उनकी रैलियों में अरबों रुपये की धनराशि भी इन्हीं पूंजीपतियों ने खर्च की जिनके लिए नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक काम करते आये हैं पेट्रो पदार्थों के बाद राफेल सौदे में हुई ड्रील के बाद और सीबीआई प्रकरण से अब सारे मामले परत दर परत खुलने प्रारम्भ हो गए हैं तथा जनवरी तक देश की राजनीति में किसी बड़े भूचाल की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। यह भी संभावना है कि नरेन्द्र मोदी इंदिरा गांधी वाले निर्णय की भी पुनरावृत्ति कर सकते हैं।
गुजरात माडल क्या है इसका अनुभव देश की जनता बीते चार वर्षों से करती आ रही है, गुजरात माडल अंग्रेजों द्वारा लागू की गई सत्ता चलाने की वह नीति है जिसके तहत एक को दूसरे से लड़वाकर उसकी शक्ति कमजोर करना, किसी दल, परिवार अथवा गठबंधन को तुड़वाकर उसकी शक्ति समाप्त करना, अधिकारियों को अच्छे पद का लालच देकर दूसरे के प्रतिकूल कार्यवाही कराना तथा पूंजीपतियों वाले वे सभी व्यापारिक हथकण्डे जिनके आधार पर एक अकेला पंूजीपति देश तथा विदेशों में फैले अपने कारोबार को अकेला संचालित कर लेता है और कहीं से घाटा न उठाकर सभी संस्थानों से लाभ कमाता है। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही इसी गुजरात माडल पर कार्य शुरु किया और उनको सहयोग मिला उनकी मूल संस्था का जो आजादी से पूर्व अंग्रेजों की सहयोगी थी तथा उनके लिए मुखबिरी करती बतायी जाती है अंग्रेजों की भी यही नीति थी कि आपस में फूट डालो और राज करो यही नीति हमारे देश में अपनायी जा रही है यही कारण है कि इन चार वर्षों में राष्ट्र की एकता, अखण्डता, असहिष्णुता के साथ ही धार्मिक एवं सामाजिक एकता के क्षेत्र में कोई काम न होकर केवल भय का वातावरण बनाकर शासन किया गया। समाज और राजनीति में व्याप्त भय के वातावरण का ही परिणाम है कि किसी नेता ने मोदी का पुतला जलाने की हिम्मत नहीं की, लालू प्रसाद यादव को छोड़कर बड़े-बड़े धुरधर नेता दुम दबाये बैठे हैं और मोदी के इशारे पर कार्य कर रहे हैं।
बताया जाता है कि गुजरात में भी 2005 से 2014 तक विभिन्न विभागों के अधिकारियों को आपस में भिड़ाने की कई घटनायें सामने आयी थी जो दिल्ली में 2014-15 के बाद विकराल रुप ले गयीं। वर्तमान सत्ता में जिन संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा गिरी उनमें बैंकिंग व्यवस्था, चुनाव आयोग, न्यायपालिका का जब सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायधीशों ने मुख्य न्यायधीश के विरोध में झंडा उठाया और अब सीबीआई की जो दुर्दशा हुई उससे पूरा देश शर्मसार है और विदेशों में भारत की खिल्ली उड़ रही है। विदेशी कम्पनियां वर्तमान प्रधानमंत्री को भारत के पूर्व शासक जहांगीर का अवतार समझ कर भारत में व्यापार के लिए आतुर हैं शायद वे ईस्ट इण्डिया कम्पनी बनने की उम्मीद लगाये बैठी हैं। देश की जनता को सावधान रहना होगा।

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