हरिद्वार। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के दो टुकड़ों में बंट जाने के बाद अब अन्य विपक्षी दलों की बांछे खिल गयी हैं और सरकार चलाने में हर मोर्च पर विफल हो चुकी भाजपा में भी आशा की किरणें जागृत होने लगी हैं। समाजवादी पार्टी में अपने भाई मुलायम सिंह यादव तथा भतीजे अखिलेश यादव की कार्यशैली से क्षुब्ध शिवपाल सिंह यादव ने अब प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया के नाम से अपना अलग राजनैतिक दल पंजीकृत करवा लिया है जो आगामी वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में यूपी की सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ेगा।
उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी में विगत डेढ़ वर्ष से अंर्तकलह चल रहा था। सपा के संस्थापक अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव सपा को अपनी पैतृक सम्पत्ति समझते हुए विरासत के तौर पर अपने सगे पुत्र अखिलेश यादव को ही सपा का उत्तराधिकारी बनाने का मन बना चुके थे इसके लिए उन्होने अनेकों राजनैतिक दांवपेंच चले अंततोगत्वा जिन अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी लगातार दो चुनाव हारी उन्हें ही पार्टी का सर्वेसर्वा बना दिया तथा जो भाई शिवपाल सिंह पार्टी के गठन से लेकर अब तक उनके साथ कंधे से कंधा मिलाये खड़े रहे उन्हें सपा से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया। डेढ़ साल तक चली इसी उठापटक को सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश ही नहीं सम्पूर्ण भारतवर्ष ने यह ड्रामा देखा। इस ड्रामे में जिस प्रकार के घटनाक्रम हुए उसके आधार पर सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश की जनता की सहानुभूति शिवपाल सिंह यादव के साथ जुड़ गयी, परिणाम स्वरुप गत अगस्त में घोषित किए गए शिवपाल सिंह यादव के समाजवादी सेक्यूलर मोर्चा के प्रति जनता का लगाव बढ़ा तथा समाजवादी पार्टी से लोगों की आस्था कम हुई कि एक सपा का नेता अपने भाई का नहीं हुआ और दूसरा अपने चाचा का नहीं हुआ वह जनता या सपा के अन्य नेताओं का कैसे हो सकता है?
समाजवादी पार्टी से तिरस्कृत हुए शिवपाल सिंह यादव के साथ आज सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश ही नहीं अन्य निकटवर्ती प्रदेशों की जनता की भी सहानुभूति है यही कारण है कि यूपी में अखिलेश का कुनबा कम हो रहा और शिवपाल सिंह का बढ़ रहा है। शिवपाल सिंह यादव द्वारा अलग पार्टी बनाने से सर्वाधिक खुशियां बसपा और भाजपा में हैं कि अब उनका एक कांटा निकल गया और सपा के प्रत्यक्ष रुप में दो टुकड़े हो जाने के बाद यह अभी से तय समझा जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश यादव मुख्यमंत्री नहीं बन पायंेगे। शिवपाल सिंह यादव की लोकप्रियता का मुख्य कारण उनका जनता से जुड़ाव एवं व्यवहार है जबकि अखिलेश यादव राजनैतिक परिपक्वता में आने से पूर्व ही यूपी जैसे बड़े राज्य के मुखिया बन गए तथा मुख्यमंत्री का यह नियम होता है वह ब्यूरोक्रेसी का कैदी बनकर रहता है ये अधिकारी उसे किसी भी सामान्य या विशिष्ट जन से मिलने ही नहीं देते हैं अतः मुख्यमंत्री के रुप में अखिलेश यादव प्रदेश की जनता से दूर रहे और शिवपाल सिंह यादव अपने जनता दरबारों के माध्यम से सम्पूर्ण जनता के सम्पर्क में रहे परिणाम स्वरुप यूपी की जनता तथा सपा के नेता एवं कार्यकर्त्ता अखिलेश के स्थान पर शिवपाल सिंह यादव से जुड़ने में स्वाभिमान की अनुभूति कर रहे हैं।
यूपी में वर्तमान स्थिति यह है कि राज्य के लगभग दो दर्जन जनपद ऐसे हैं जहां अखिलेश यादव की तुलना में शिवपाल सिंह यादव का ग्राफ ऊंचा है और ऐसी ही लहर चलती रही तो यह भी संभव हो सकता है कि आगामी विधानसभा चुनाव आते-आते शिवपाल सिंह की लोकप्रियता अखिलेश यादव एवं मायावती की तुलना में कहीं अधिक ऊपर पहुंच जाये।
उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी में विगत डेढ़ वर्ष से अंर्तकलह चल रहा था। सपा के संस्थापक अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव सपा को अपनी पैतृक सम्पत्ति समझते हुए विरासत के तौर पर अपने सगे पुत्र अखिलेश यादव को ही सपा का उत्तराधिकारी बनाने का मन बना चुके थे इसके लिए उन्होने अनेकों राजनैतिक दांवपेंच चले अंततोगत्वा जिन अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी लगातार दो चुनाव हारी उन्हें ही पार्टी का सर्वेसर्वा बना दिया तथा जो भाई शिवपाल सिंह पार्टी के गठन से लेकर अब तक उनके साथ कंधे से कंधा मिलाये खड़े रहे उन्हें सपा से बाहर जाने के लिए मजबूर कर दिया। डेढ़ साल तक चली इसी उठापटक को सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश ही नहीं सम्पूर्ण भारतवर्ष ने यह ड्रामा देखा। इस ड्रामे में जिस प्रकार के घटनाक्रम हुए उसके आधार पर सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश की जनता की सहानुभूति शिवपाल सिंह यादव के साथ जुड़ गयी, परिणाम स्वरुप गत अगस्त में घोषित किए गए शिवपाल सिंह यादव के समाजवादी सेक्यूलर मोर्चा के प्रति जनता का लगाव बढ़ा तथा समाजवादी पार्टी से लोगों की आस्था कम हुई कि एक सपा का नेता अपने भाई का नहीं हुआ और दूसरा अपने चाचा का नहीं हुआ वह जनता या सपा के अन्य नेताओं का कैसे हो सकता है?
समाजवादी पार्टी से तिरस्कृत हुए शिवपाल सिंह यादव के साथ आज सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश ही नहीं अन्य निकटवर्ती प्रदेशों की जनता की भी सहानुभूति है यही कारण है कि यूपी में अखिलेश का कुनबा कम हो रहा और शिवपाल सिंह का बढ़ रहा है। शिवपाल सिंह यादव द्वारा अलग पार्टी बनाने से सर्वाधिक खुशियां बसपा और भाजपा में हैं कि अब उनका एक कांटा निकल गया और सपा के प्रत्यक्ष रुप में दो टुकड़े हो जाने के बाद यह अभी से तय समझा जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश यादव मुख्यमंत्री नहीं बन पायंेगे। शिवपाल सिंह यादव की लोकप्रियता का मुख्य कारण उनका जनता से जुड़ाव एवं व्यवहार है जबकि अखिलेश यादव राजनैतिक परिपक्वता में आने से पूर्व ही यूपी जैसे बड़े राज्य के मुखिया बन गए तथा मुख्यमंत्री का यह नियम होता है वह ब्यूरोक्रेसी का कैदी बनकर रहता है ये अधिकारी उसे किसी भी सामान्य या विशिष्ट जन से मिलने ही नहीं देते हैं अतः मुख्यमंत्री के रुप में अखिलेश यादव प्रदेश की जनता से दूर रहे और शिवपाल सिंह यादव अपने जनता दरबारों के माध्यम से सम्पूर्ण जनता के सम्पर्क में रहे परिणाम स्वरुप यूपी की जनता तथा सपा के नेता एवं कार्यकर्त्ता अखिलेश के स्थान पर शिवपाल सिंह यादव से जुड़ने में स्वाभिमान की अनुभूति कर रहे हैं।
यूपी में वर्तमान स्थिति यह है कि राज्य के लगभग दो दर्जन जनपद ऐसे हैं जहां अखिलेश यादव की तुलना में शिवपाल सिंह यादव का ग्राफ ऊंचा है और ऐसी ही लहर चलती रही तो यह भी संभव हो सकता है कि आगामी विधानसभा चुनाव आते-आते शिवपाल सिंह की लोकप्रियता अखिलेश यादव एवं मायावती की तुलना में कहीं अधिक ऊपर पहुंच जाये।
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