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चुनाव में जनता चुकायेगी सरकारी कार्यशैली का बदला

हरिद्वार। उत्तराखण्ड में स्थानीय निकाय चुनावों की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी है। लोकतांत्रिक प्रणाली में चुनावों के नतीजे ही सरकार की कार्यशैली के प्रमाण होते हैं क्योंकि जनता के हाथ में पांच साल बाद ही मताधिकार रुपी वह चाबी एक बार आती है जब वह बताती है कि उसके चयनित प्रत्याशियों ने जो किया उससे जनता खुश है या नाखुश। उत्तराखण्ड राज्य के मैदानी जनपदों विशेषकर देहरादून, हरिद्वार एवं उधमसिंह नगर में अतिक्रमण एवं मार्गों के चौड़ीकरण के नाम पर आम जनता तथा व्यापारियों के साथ सरकारी अमले का कैसा बर्ताव रहा उसका जवाब जनता इन चुनावों में देगी। उत्तराखण्ड की डबल इंजन वाली सरकारी गाड़ी की चाल कैसी रही जनता इसका प्रमाण प्रस्तुत करेगी। राज्य के मैदानी जनपदों में पहाड़ से हुए पलायन के बाद आबादी का भार बढ़ गया था जिससे आवागमन की समस्या विकराल रुप धारण कर चुकी थी तो सरकार ने उच्च न्यायालय का सहारा लेकर समस्या के समाधान का जो रास्ता निकाला उससे जनता में क्या प्रतिक्रिया हुई है स्थानीय निकाय चुनाव से स्पष्ट हो जायेगी। 
गढ़वाल मण्डल में देहरादून के बाद हरिद्वार में त्योहारी सीजन नवरात्र और दीपावली से पूर्व अतिक्रमण हटाओ अभियान में रुप जो तोड़फोड़ हुई उससे व्यापारियों के साथ ही समाज का प्रत्येक वर्ग प्रभावित हुआ। तोड़फोड़ के समय जनता तड़फती रही लेकिन किसी भी राजनेता या प्रशासनिक अधिकारी ने जनता की आवाज न सुनकर जमकर मनमानी की जिससे जनता त्रस्त है। 
स्थानीय निकायों के चुनाव स्थानीय जनता के हितों से जुड़े होते हैं और जनता उसी का चयन करता है जो दल या प्रत्याशी उसको सुविधायें प्रदान करने का काम करता है। स्थानीय निकाय चुनाव में गृहकर, जलकर, सीवर, सड़क तथा स्ट्रीट लाइटों से सम्बन्धित समस्यायें ही होती हैं जिनके सरलीकरण के लिए जनता अपने प्रतिनिधियों का चयन करती है। 
चुनाव जीतने के तीन मुख्य कारक होते हैं जिनके तहत जनता को दूसरे के प्रति भ्रमित किया जाता है, लालच देकर लुभाया जाता है और भविष्य की योजनायें बताकर हरा-हरा दिखाया जाता है। सत्तारुढ़ दल बताता है कि प्रदेश में जिस दल की सरकार होती है उसके वोर्ड को अधिक धन मिलता है जबकि ऐसा कोई कानून नहीं है और जनता राज्य में डबल इंजन की सरकार देख चुकी है। विपक्षी दल सत्तारुढ़ दल की नाकामियों, असफलताओं तथा तानाशाही का ब्योरा प्रस्तुत करते हैं जैसा कि जनता स्वयं अनुभव कर चुकी होती है। जहां तक गृहकर का मामला है तो सरकार ने स्वकर निर्धारण का वास्ता देकर गृहकर की धनराशि कई गुना बढ़ा दी वहीं जलकर एवं सीवर को शुद्ध रुप से सरकारी व्यापार के रुप में लागू कर दिया है। शहर में खुदी पड़ी सड़कों की सुध लेने वाला कोई नहीं तो कुछ सड़कें तो ऐसी हैं जो मई में तैयार हुई जून में बरकरार रहीं और जुलाई से प्रारम्भ हुई बरसात में क्षतिग्रस्त हो गयीं तो अब चुनाव आते ही उनके बनने की प्रक्रिया पुनः प्रारम्भ कर दी गई। राज्य के मैदानी शहरों में चलाये गए हेलमेट अभियान एवं पॉलीथिन हटाओ अभियान ने जनता को कैसे-कैसे अनुभव कराये जनता उन्हें आसानी से नहीं भुला सकती।
अतिक्रमण हटाओ अभियान कोई नया नहीं है ऐसे अभियान पहले भी चलते रहे। वाहनांे की चेकिंग भी होती थी और यातायात के नियम भी लागू होते थे लेकिन वर्तमान में जनता ने जो अनुभव किए वे कहीं न कहीं सरकार की नीति और नियति को जनता के प्रति सहज ही व्यक्त कर रहे हैं। दूसरे दलों या प्रत्याशियों की आलोचना करना राजनेताओं का अधिकार हो सकता है लेकिन उसकी अपनी उपलब्धियां भी तो होनी चाहिए और अपनी सरकार द्वारा किए गए विकास कार्य होने चाहिए जिनको आधार बनाकर वह जनता के वोट का हकदार हो सकता है। अतीत का चुनावी इतिहास देखें तो सत्तापक्ष ही जनता के निशाने पर होता है और विपक्ष के प्रति जनता की सहानुभूति होती है और उसके पिछले विकास कार्यों की स्मृति भी होती है जो बदलाव का कारण बनती है। वर्तमान चुनाव भले ही स्थानीय स्तर के हैं लेकिन इनका संकेत लोकसभा चुनाव की तरफ भी होगा।

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