हरिद्वार। लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत जनता अपने प्रतिनिधियों का चयन कर समाज के लिए कानून, व्यवस्था तथा विकास करने का अधिकार देती है लेकिन आज वोट की राजनीति ने कई अन्य विकल्प तलाश लिए हैं इसीलिए जन प्रतिनिधि जनता का वोट लेकर उसे भूल जाते हैं। देश के विभिन्न लोकसभा तथा विधानसभाओं में किए गए सर्वे के अनुरुप सर्वाधिक मायूस उस क्षेत्र के मतदाता होते हैं जो अपने क्षेत्र के अलावा बाहर के प्रत्याशियों का चयन करते हैं। यही कारण है कि देश और समाज में जनता का विश्वास अपने चयनित प्रत्याशियों से उठ गया है।
देश की आजादी को सत्तर साल हो गए हैं तथा 1952 से अब तक देश की जनता लोकसभा तथा विधानसभाओं के 30 से 40 चुनावों में अपने मताधिकार का प्रयोग कर चुकी है। यह सत्य है कि राजनेता चुनाव से पूर्व किए गए सभी वादे पूर्ण नहीं कर पाते हैं लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि सरकार चुनाव पूर्व किए सभी वादों को भुलाकर देश की जनता का ध्यान विकास से हटाकर व्यर्थ के मुद्दों में उलझा कर उसे मायूस करे। वर्तमान सरकार और देश के प्रधानमंत्री से देश की जनता पहली बार मायूसी का एहसास कर रही है। पहली बात तो यही है कि देश की जनता ने 2014 के लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी को वोट न देकर व्यक्ति विशेष के नाम पर मतदान किया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के साथ ही उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट से भी चुनाव लड़ा और दोनों स्थानों से जीते भी उस समय बनारस की जनता स्वयं को गौरवान्वित महूसस कर रही थी कि वह एक प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान कर धन्य हो जायेगी और उसके क्षेत्र में पूरे देश की तुलना में सर्वाधिक विकास हांेगे। यह सत्य सिद्ध हो गया है कि जनता जब भी किसी बड़े लालच में फंसकर मतदान करती है तभी उसको सर्वाधिक पछताना पड़ता है। जनता यह भूल गयी थी कि वह एक बाहरी प्रत्याशी को जिता रही है क्योंकि जनता धार्मिक भावनाओं में बह गयी थी उसे बताया गया था कि उस प्रत्याशी को गंगा मैया ने बुलाया है। परिणाम यह हुआ कि चुनाव जीतने के बाद उस बाहरी प्रत्याशी ने उस क्षेत्र की जनता और गंगा मैया दोनों को ही भुला दिया। यह कोई नया प्रयोग नहीं है और न ही नरेन्द्र मोदी ने बनारस की जनता को ठगा है ऐसा हमारे देश में पूर्व से ही होता आया है।
मेनका गांधी का पीलीभीत एवं बरेली से कोई नाता नहीं है लेकिन चुनाव जीत जाती हैं पीलीभीत और बरेली की जनता स्वयं को ठगा महसूस करती है। अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ से और मुलायम सिंह यादव ने आजमगढ़ से चुनाव जीते वहां की जनता से उनकी उपलब्धि पूछ लो नेहरु परिवार के इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी से लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी का चुनाव क्षेत्र सुल्तानपुर, रायबरेली है ये वो नेता हैं जो सत्ता के शीर्ष पर रहे पर क्षेत्र में कोई विशेष उपलब्धि नहीं। हरिद्वार लोकसभा सीट भी बाहरी प्रत्याशियों के लिए वरदान सिद्ध हुई है यहां से कई बाहरी प्रत्याशी जीते लेकिन उपलब्धि शून्य है इतना ही नहीं नया राज्य बनने के बाद हरीश रावत और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जैसे राज्य के मुख्यमंत्री स्तर के नेता हरिद्वार से सांसद बने लेकिन विकास के नाम पर कोई विशेष उपलब्धि नहीं। यह कहानी केवल यूपी एवं उत्तराखण्ड की ही नहीं है जितने अभिनेता से नेता बने उन्होंने भी अपने-अपने क्षेत्रों के लिए कुछ नहीं किया यही हाल संतों का है वे भी वोट लेने के बाद क्षेत्र से ऐसे गायब हो जाते है जैसे एक जानवर का सिर बिना सींगों के बेशोभा लगता है।
देश की जनता अब नाचने गाने वाले अभिनेता तथा घर गृहस्थी छोड़ कर संत बने कथित राजनेताओं को भली प्रकार समझ गयी है रही सही कसर यूपी के संत मुख्यमंत्री ने पूरी कर दी। हमारे देश में आज संतों के चरित्र पर तरह-तरह की किवदन्तियां चल रही है ंऐसी स्थिति में यूपी के मुख्यमंत्री ने वहां पुलिस को निरंकुश बनाकर संतों की रही सही छवि भी धूमिल कर दी। देश की जनता ने यह भी अनुभव किया है कि नेता चाहे कितना ही लोकप्रिय हो वह स्थानीयता को ही महत्व देता है। इसका स्पष्ट प्रमाण मिलता है सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से उन्हांेने एक बार जनपद शाहजहांपुर की तहसील तिलहर से विधानसभा का चुनाव लड़ा और विजयी हुए लेकिन तिलहर की जनता के लिए कुछ नहीं किया क्योंकि वह क्षेत्र उनके तत्कालीन प्रतिद्वन्दी सत्यपाल सिंह यादव का था। वहीं मुलायम सिंह यादव ने अपने गृह जनपद के सैफई गांव का इतना विकास किया कि वह भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में सबसे विकसित गांव है जहां राष्ट्रीय स्तर की लगभग सभी सुविधायें उपलब्ध हैं ऐसा विकास भारत के किसी राजनेता ने अपने क्षेत्र में नहीं किया। इससे स्पष्ट होता है कि आगामी चुनाव चाहें लोकसभा का हो या विधानसभा का जनता स्थानीय प्रत्याशी को ही वरीयता प्रदान करेगी। ऐसा करने से न केवल संविधान का सम्मान होगा बल्कि क्षेत्र का विकास भी होगा। आशा है अगला चुनाव विकास के मुद्दे पर ही लड़ा जायेगा।
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