केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा तीन तलाक बिल पास करने तथा राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर कर देने के बाद ही मुस्लिम संगठनों में विरोध के स्वर बुलन्द होने प्रारम्भ हो गए है। भाजपा सरकार इससे पूर्व भी दो सत्रों में तीन तलाक बिल ला चुकी है लेकिन राज्य सभा से स्वीकृति न मिलने के कारण इस बार भाजपा कैबिनेट की स्वीकृति के बाद राष्ट्रपति से हस्ताक्षर कराने में कामयाब हो गयी है जो आगामी छः माह तक लागू रहेगा तथा बाद में बिल के रुप में सरकार को संसद से पास कराने के लिए दोबारा प्रस्तुत करना होगा। भाजपा सरकार द्वारा पारित तीन तलाक अध्यादेश पर इस्लामी शिक्षण संस्थान दारुल उलूम देवबन्द ने अध्यादेश की निन्दा करते हुए इसे मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दखलंदाजी बताया है तो आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने सख्त नाराजगी व्यक्त करते हुए भावी रणनीति बनाने का मसौदा तैयार किया है बोर्ड के महासचिव मौलाना बली रहमानी का कहना है कि सरकार से बोर्ड को यह अंदेशा था कि वह अध्यादेश ला सकती है और सरकार ने जो बदलाव किए हैं वे तर्कसंगत नहीं हैं अतः बोर्ड सुप्रीम कोर्ट जा सकता है बोर्ड अपनी बैठक में इस ममाले पर फैसला लेगा। उन्हाने केन्द्रीय सरकार पर मुसलमानों को भ्रमित करने का आरोप लगाते हुए कहा कि इससे दूसरे धर्म के लोगों में उनकी छवि खराब होगी। उन्होंने केन्द्रीय सरकार की मंशा पर राय व्यक्त करते हुए कहा कि वह मुस्लिम महिला एवं पुरुषों में बंटवारा करना चाहती है तथा महिलाओं की कथित हिमायती बनकर उनसे दूरी बनाना चाहती है ऐसा करने में वह माहिर है। भाजपा पर मुस्लिम महिलाओं को भ्रमित कर राजनैतिक लाभ लेने का आरोप लगाते हुए रहमानी ने कहा कि इस प्रक्रिया में पहले मुस्लिम पक्ष की राय लेनी चाहिए थी ऐसा न करने से ध्ाार्मिक व्यवस्थाओं की अनदेखी हुई है। सरकार द्वारा तीन तलाक अध्यादेश के अनुसार पत्नी को मौखिक, लिखित या इलैक्टिन्न्क माध्यमों से तीन तलाक देना गैर कानूनी होगा जिसके लिए जुर्माने के साथ ही तीन वर्ष के कारागार का प्रावधान किया गया है। पीड़िता के पास यदि नाबालिग बच्चा है तो उसके पालन-पोषण का अधिकार बच्चे की मां को होगा और मजिस्ट्रेट ट्रायल द्वारा बच्चे के भरण-पोषण को तय किया जायेगा। हालांकि केंद्रीय सरकार द्वारा तैयार किए गए अपने विधेयक के पास न होने के बाद उसने कुछ संशोध्ान भी किए हैं जिसके अनुसार पीड़िता का पक्ष सुनकर मजिस्टेन्न्ट ट्रायल से पहले जमानत दे सकता है तथा घटना की सूचना स्वयं पीड़िता या उसके परिजन ही दर्ज करा सकते हैं जबकि हलाला की बाध्यता समाप्त कर मजिस्ट्रेट को पति-पत्नि के बीच आपसी सहमति से समझौता कराकर शादी बरकरार रखने का अधिकार होगा तथा एक बार में तीन तलाक पीड़िता गुजारा भत्ता की हकदार भी होगी।
समाचार-पत्र समाज के मार्ग दर्शक होते हैं और समाज के आईना (दर्पण) भी होते हैं, समाचार-पत्र का प्रकाशन एक ऐसा पवित्र मिशन है जो राष्ट्र एवं समाज को समर्पित होता है। समाचार-पत्र ही समाज और सरकार के बीच एक सेतु का काम करते हैं, जनता की आवाज सरकार तक तथा सरकार की योजनायें जनता तक पहुंचाकर विकास का सोपान बनते हैं। आजादी के पूर्व तथा आजादी के बाद से लगभग पांच दशक तक समाचार-पत्रों ने सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका का निर्वाह किया। 1975 में लगे आपातकाल से भी समाचार-पत्र विचलित नहीं हुए और उन्होंने अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह किया ऐसा तब तक ही हुआ जब तक पत्रकार ही समाचार पत्र के प्रकाशक, स्वामी एवं संपादक होते थे ऐसा अब नहीं है। समाचार पत्रों की निष्पक्षता और निर्भीकता कुछ पंूजीपतियों को रास नहीं आयी और उन्होंने मीडिया जगत पर अपना प्रभुत्व जमाना प्रारम्भ कर दिया। पहले तो समाचार-पत्रों की जनता से पकड़ ढीली करने के लिए इलैक्ट्रोनिक मीडिया को जन्म दिया और बाद में प्रिंट मीडिया का स्वरुप बदल कर उसके मिशन को समाप्त कर व्यावसायिकता में बदल दिया। चंद पूंजीपतियों ने सरकार से सांठगांठ कर मीडिया...
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