हरिद्वार। युग बदल रहा है, देश बदल रहा है नेताओं की जुबान बदल रही है और जो कहा जा रहा उसका उल्टा किया जा रहा तो समझ लो कि आजाद मुल्क को गुलाम बनाने की साजिश रची जा रही है क्योंकि स्वतंत्र देश के सत्तर वर्षों के इतिहास में पहली बार ऐसा महसूस किया जा रहा है कि सारी शक्तियां एक ही व्यक्ति में केन्द्रित हो गयी हैं वह सेना के अधिकारियों पर भी भारी है तो भ्रष्टाचार एवं अपराध करने वालों को सलाखों के पीछे पहुंचाने वालों को भी सलाखों के पीछे पहुंचाया जा रहा है। अब यह सिद्ध हो रहा है कि उस बंदे ने कुर्सी संभालने से पहले जो कहा कुर्सी पर बैठने के बाद ठीक उसका उलटा किया।
देश की जनता को यदि 2013-14 में लोकसभा चुनाव से पूर्व किए गए वादे याद हों तो एक-एक वादे पर शोध करके देखें कि जो कहा था उसका उलटा हुआ कि नहीं। देश से कालाधन समाप्त करने और विदेशों से कालाधन वापस लाने की बात हुई थी जोर इस बात पर था कि विदेशों में जमा कालाधन वापस भारत लाया जायेगा ठीक उसका उलटा हुआ कि एक चवन्नी भी उस कालेधन में से भारत नहीं आयी बल्कि विदेशी बैंकों में उस समय की तुलना में जमा राशि और बढ़ गयी तथा कई लाख करोड़ के कर्जदार भारत का धन लेकर खुलेआम विदेश भाग गए इससे बड़ी डकैती देश में आज तक नहीं पड़ी। देश का धन विदेशों में जा रहा है और देश कंगाली के कंगार पर जा रहा है। नोटबंदी का जो आधार बताया गया था ठीक उसका उलटा किया गया यह विश्व का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है जिसके कारण देश पिछड़ रहा है।
नए छापे गए नोटों में एक ही नम्बर के तीन नोट मिलने से स्पष्ट हो रहा है कि नोटों की छपाई बड़ी मात्रा में हुई है जो मुद्रा विनिमय के मानकों के विपरीत है परिणाम स्वरुप देश की अर्थव्यवस्था खराब होने के संकेत मिलने प्रारम्भ हो गए हैं और इस व्यवस्था को यदि समय रहते दोबारा सम्पूर्ण नोटबंदी करके नहीं संभाला गया तो कोई भी राजनेता ऐसा पैदा नहीं हुआ जो इस देश को चला सके क्योंकि नए नोटों की इतनी भरमार हो गयी है कि राजनेता एवं पार्टियों को भारी भरकम रकमें देकर खरीदा जा रहा है इन नोटों की चमक के कारण नेता चरित्रहीन, इंसानियत विहीन एवं ईमानविहीन हो गए हैं इस नई करेंसी के आने के बाद राजनेता एवं ब्यूरोक्रेसी के चाल चलन और कार्य व्यवहार सब बदल गए हैं। कौन कब किस रास्ते पर चल पड़े किसी के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इस चमक में फंसकर अनेकों राजनेताओं ने अपने ईमान और संस्कार सब रद्दी की टोकरी में डाल दिए शायद उन्हें यह ज्ञात नहीं कि नोटबंदी दोबारा हो गयी तो उनका क्या हस्र होगा। जो देना जानता है वह लेना भी जानता है और प्रकृति का यह नियम है कि न कोई लेकर आता न ही जाता, सब खाली हाथ आते है और खाली हाथ ही जाते हैं। जब एक ही मछली पूरे तालाब के पानी को गंदा कर देती है तो अन्य मछलियां उस गंदे पानी में रहकर अंधी हो जाती हैं। वर्तमान में यही वातावरण बनाया गया है और चांदी की चमक ने सभी के चरित्र को चौपट कर दिया है। प्यारे देशवासियों जरा सोचो 1947 से 2014 तक देश की राजनैतिक का स्वरुप कैसा था और 2014-15 के बाद इस देश का राजनैतिक भविष्य कैसा हो गया? मामला जब देश और भावी पीढ़ी के भविष्य का हो तो देर नहीं करनी चाहिए और जब आंखे खुल जायें तभी सबेरा मान लेना चाहिए क्योंकि अच्छे काम के लिए कभी देर नहीं होती है।
देश की जनता को यदि 2013-14 में लोकसभा चुनाव से पूर्व किए गए वादे याद हों तो एक-एक वादे पर शोध करके देखें कि जो कहा था उसका उलटा हुआ कि नहीं। देश से कालाधन समाप्त करने और विदेशों से कालाधन वापस लाने की बात हुई थी जोर इस बात पर था कि विदेशों में जमा कालाधन वापस भारत लाया जायेगा ठीक उसका उलटा हुआ कि एक चवन्नी भी उस कालेधन में से भारत नहीं आयी बल्कि विदेशी बैंकों में उस समय की तुलना में जमा राशि और बढ़ गयी तथा कई लाख करोड़ के कर्जदार भारत का धन लेकर खुलेआम विदेश भाग गए इससे बड़ी डकैती देश में आज तक नहीं पड़ी। देश का धन विदेशों में जा रहा है और देश कंगाली के कंगार पर जा रहा है। नोटबंदी का जो आधार बताया गया था ठीक उसका उलटा किया गया यह विश्व का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है जिसके कारण देश पिछड़ रहा है।
नए छापे गए नोटों में एक ही नम्बर के तीन नोट मिलने से स्पष्ट हो रहा है कि नोटों की छपाई बड़ी मात्रा में हुई है जो मुद्रा विनिमय के मानकों के विपरीत है परिणाम स्वरुप देश की अर्थव्यवस्था खराब होने के संकेत मिलने प्रारम्भ हो गए हैं और इस व्यवस्था को यदि समय रहते दोबारा सम्पूर्ण नोटबंदी करके नहीं संभाला गया तो कोई भी राजनेता ऐसा पैदा नहीं हुआ जो इस देश को चला सके क्योंकि नए नोटों की इतनी भरमार हो गयी है कि राजनेता एवं पार्टियों को भारी भरकम रकमें देकर खरीदा जा रहा है इन नोटों की चमक के कारण नेता चरित्रहीन, इंसानियत विहीन एवं ईमानविहीन हो गए हैं इस नई करेंसी के आने के बाद राजनेता एवं ब्यूरोक्रेसी के चाल चलन और कार्य व्यवहार सब बदल गए हैं। कौन कब किस रास्ते पर चल पड़े किसी के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। इस चमक में फंसकर अनेकों राजनेताओं ने अपने ईमान और संस्कार सब रद्दी की टोकरी में डाल दिए शायद उन्हें यह ज्ञात नहीं कि नोटबंदी दोबारा हो गयी तो उनका क्या हस्र होगा। जो देना जानता है वह लेना भी जानता है और प्रकृति का यह नियम है कि न कोई लेकर आता न ही जाता, सब खाली हाथ आते है और खाली हाथ ही जाते हैं। जब एक ही मछली पूरे तालाब के पानी को गंदा कर देती है तो अन्य मछलियां उस गंदे पानी में रहकर अंधी हो जाती हैं। वर्तमान में यही वातावरण बनाया गया है और चांदी की चमक ने सभी के चरित्र को चौपट कर दिया है। प्यारे देशवासियों जरा सोचो 1947 से 2014 तक देश की राजनैतिक का स्वरुप कैसा था और 2014-15 के बाद इस देश का राजनैतिक भविष्य कैसा हो गया? मामला जब देश और भावी पीढ़ी के भविष्य का हो तो देर नहीं करनी चाहिए और जब आंखे खुल जायें तभी सबेरा मान लेना चाहिए क्योंकि अच्छे काम के लिए कभी देर नहीं होती है।
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